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काहे बनाए तूने माटी के पुतले......✒️ खुशहाल हुसैन रिजवी की कलम से

 

राजकपूर की फिल्म ‘तीसरी कसम’ में एक गाना था दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई कहे को दुनिया बनाई, काहे बनाये तूने माटी के पुतले.... गाना सुनते समय इसने मुझे बहुत अन्दर से झकझोर दिया। सच में कभी-कभी मन ये सोचने पर मजबूर हो जाता है कि इंसान दुनिया में आता है और फिर एक दिन मौत की आगोश में चला जाता है। जहां से लौट के कभी नहीं आता। दुनिया रुपी इस रंगमंच में कठपुतली बना इंसान कई रिश्तों को निभाता है। बाप-मां, बेटा, भाई-बहन, चाचा-चाची, मामा-मामी, दाद-दादी, नाना-नानी आदि। इन संबंधों में उसका सुख-दुख, रोना-हसना, मिलना-बिछड़ना, रुठना-मनाना ऐसे कई ताने-बाने और एहसास शामिल होते है। भरसक वह इन सब के लिए बहुत मेहनत करता है। ताकि परिवार के लोगों का जीवन ठीक से गुजरे सके। उन्हे किसी चीज की कमी न हो। इसके साथ ही साथ रिश्तेदार-नातेदार को भी समय-समय पर अपने होने का एहसास भी कराता रहता है। और एक दिन दुनिया के रंगमंच को चलाने वाला कठपुतली की डोर खींच लेता है और इंसान दुनिया छोड़ मौत की आगोश में चला जाता है। वह अपने पीछे वह सब छोड़कर चला जाता है जिसके लिए उसने जीवन भर कड़ी मेहनत और न जाने कौन-कौन से जतन किये थे। जबतक इस संसार में वो मौजूद रहा न जाने कितने हसीन पल परिवार, रिश्तेदारों, नातेदारों, दोस्तों, आस-पड़ोस के साथ बिताये। अब उसके जाने के बाद सिर्फ उसकी यादे ही लोगों को उसके होने का एहसास कराती है।
अजब है न ये संसार भी इंसान जब जन्म लेता है तो परिवार के लोग खुश होते है और जब दुनिया से जाता है तो सभी को रुला जाता है। इंसान का दुनिया में आना और फिर चला जाना बस इतना सा फलसफा है जिन्दगी का। लेकिन इस जिन्दगी को जीने के लिए न जाने कितना जतन और मेहनत करनी पड़ती है। जीवन के अंतिम क्षणों तक इंसान इसी कशमकश में रहता है की वह अपना किरदार निभाने में सफल हुआ या असफल।
बच्चा जब जन्म लेता है तो रोता हुआ इस दुनिया में आता है। लोगों ने रोने के नजरिये पर अपने अलग-अलग विचार दिये है। लेकिन मेरा अपना ये विचार है कि जैसे वह बच्चा कहना चा रहा हो की आज तुम मेरे रोने पर एक-दूसरे को बधाई देकर खुशियां मना रहे हो। जब मेरा इस दुनिया को छोड़ के जाने का समय आयेगा तो तुम लोगों को बहुत रोना आयेगा। एक बच्चा जब परिवार में जन्म लेता है तो कई रिश्तों को जन्म देता है। इसके साथ ही लड़कपन, जवानी, वृद्ध अवस्था को पार करता हुआ फिर वहीं चला जाता है जहां से वो आया होता है। इंसान एक मिट्टी का पुतला होता है और इसी पुतले में आत्मा लेकर उसका जन्म होता है। यही आत्मा जब परमात्मा में विलीन हो जाता है तो इसी को मौत कहते हैं।
इंसान के संसार में आने से लेकर दुनिया छोड़कर जाने तक चाहे वो राजा हो या रंक, पीर हो या फकीर, सभी इस दुनिया रूपी रंगमंच पर अपना-अपना किरदार निभाते है और लोगों की वाहवाही अपने किरदार के अनुसार उन्हे मिलती भी है। इंसान दुनिया में जब तक रहता है यही समझता हैं कि कामयाब हुये तो हम हिट वरना नाकामयाब हुये तो फ्लॉप, लेकिन वास्तिवकता इससे परे है। ये तो मरने के बाद ही तैय होगा कि हम कितना कामयाब रहे या नाकामयाब। क्योकि हमारे लिए संसार एक रंगमच था और उपर वाले ने हम सभी की स्क्रीपट पहले बना ली थी। स्क्रीपट के आधार पर हमारे किरदार भी तैय थे। बस हमने उन किरदारों को अपने-अपने रंग से सजाया और उसे निभाया। इसमें हम सफल हुये या असफल वह तो जो हमारा डायरेक्टर है वही बतायेगा।

रिपोर्ट- शैलेश सिंह ।

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