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सयानी बेटी की कम उम्र में शादी, माँ-बच्चे के स्वास्थ्य की बर्बादी_रवि गुप्त

 


-कम उम्र में किशोरियों की न कराएँ शादी, उन्हें भी दें आगे बढ़ने का मौका
-मिले माहौल तो तरक्की की उड़ान भर सकतीं हैं किशोरियां।


बलरामपुर 15 सितम्बर। बिटिया सयानी हो गयी है .....। बस इतनी-सी बात दिमाग मे आयी नहीं कि योग्य वर की खोज-बीन शुरू हो जाती है। रिश्तेदारी मे भी शादी की चर्चा आम होने लगती है। दिमाग मे सिर्फ एक ही बात रहती है कि घर और वर ऐसा हो कि बिटिया को कोई तकलीफ न हो। इन सारी तैयारियों के बीच बस एक बात का ध्यान किसी को नहीं रहता है कि बिटिया की उम्र क्या है और वह कितनी सयानी हो गयी है? जी हाँ हम बात कर रहे हैं बेटियों की शादी की सही उम्र और किशोरावस्था मे गर्भधारण करने से जुड़ी समस्याओं की।
किशोरावस्था यानि 20 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले गर्भ धारण करना माँ व उसके होने वाले शिशु दोनों के लिए चुनौती पूर्ण होता है। जिला महिला चिकित्सालय में तैनात स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डा. ज्योति तिवारी के अनुसार, आधुनिक चिकित्सीय व्यवस्था के बावजूद भी किशोर अवस्था मे गर्भधारण करने वाली माताएँ अक्सर कम वजन या समय से पहले शिशुओं को जन्म देती हैं। उनके प्रसव मे जटिलताएँ अधिक रहती हैं। शरीर मे खून की कमी और प्री-एक्लेम्पसिया यानि प्रसव से पहले झटके आना आदि के जोखिम बने रहते हैं। उन्होंने बताया कि गर्भावस्था से संबंधित जटिलताएं 15 से 19 वर्ष की महिलाओं में मृत्यु का सबसे आम कारण है।
राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के जिला नोडल अधिकारी डा. बी.पी. सिंह के अनुसार, “शादी अगर 18 साल की उम्र मंे हुई है, तो दो साल बाद यानि 20 वर्ष या उसके बाद की उम्र मे ही गर्भधारण करना चाहिए। इस बीच गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल कर गर्भधारण से बचना चाहिए।“ गौरतलब हो कि राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार, जिले में 20 से 24 वर्ष की 41.5 फीसदी किशोरियों की शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले हो गयी। वहीं 15 से 19 साल की 6.3 फीसदी महिलाएं या तो माँ बन गई या गर्भवती हो गई। डा. बी.पी. सिंह का कहना है कि किशोर गर्भावस्था को रोकने के लिए नए शादी-शुदा दंपत्तियों को विभाग द्वारा आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से “पहल किट” का वितरण भी कराया जा रहा है, जिसमें गर्भ निरोधक सामग्री के साथ जानकारी कार्ड, आशा कार्यकर्त्री एवं ए.एन.एम. के संपर्क सूत्र होते हैं।
राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के कोआर्डिनेटर अमरेन्द्र मिश्रा के अनुसार घर में बैठी बेटी की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, माता-पिता को उसकी शादी की चिंता होने लगती है। इसीलिए बाल विवाह के मामले में स्कूल न जाने वाली किशोरियों की संख्या सबसे अधिक है। दूसरी ओर स्कूल जाने वाली किशोरियाँ गर्भावस्था के दौरान अक्सर उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती हैं, विद्यालय मे उनकी उपस्थिति कम हो जाती है, जो आगे चलकर उनके कैरियर के अवसरों को कम करता है। अमरेन्द्र मिश्रा ने कहा कि हमें ऐसे स्वस्थ वातावरण का निर्माण करना होगा, जहां किशोरियों में सुरक्षा की भावना हो, उनके माता-पिता निर्भय होकर बेटियों की पढ़ायी आगे भी जारी करवा सकें, न कि घर बैठाकर उनके लिए योग्य वर की खोज मे सपने संजोने लगें।

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