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आवश्यकता है

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस: आपका जीवन है अनमोल, इसको न समझें कोई खेल_रवि गुप्त

 

 

 
-हताशा व निराशा में कोई भी गलत कदम न उठायें
-अपनों से करें बात करने से होता है हर समस्या का समाधान


बलरामपुर 10 सितम्बर। जीवन में जल्द से जल्द सब कुछ हासिल कर लेने की तमन्ना और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में आज लोग बेवजह मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं। इसमें जरा सी नाकामयाबी अखरने लगती है और लोग अपनी जिन्दगी तक को दांव पर लगा देते हैं। कोरोना काल में भी लाक डाउन के चलते तमाम लोगों की नौकरियां चलीं गयीं, लोगों को अपनी रोजी-रोजगार छोड़कर वापस गाँव लौटना पड़ा। लोग शुरू में इसे लेकर तनाव में थे लेकिन अपनों के बीच बैठकर जब समस्या रखी तो उसका कोई न कोई रास्ता जरूर निकला, इसलिए जब भी हताशा-निराशा में कोई भी गलत कदम उठाने की बात दिमाग में आये तो सबसे पहले अपनों के करीब जाएं।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. घनश्याम सिंह ने गुरूवार को बताया कि 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने का मकसद आत्महत्या को रोकने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करना। इसके जरिये यह सन्देश देने की कोशिश की जाती है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है। इस वर्ष विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की थीम है-‘‘आत्महत्या रोकने को मिलकर काम करना’’। कोरोना काल में मीडिया में ऐसी कई खबरें आयीं कि कोरोना उपचाराधीन ने डर के कारण आत्महत्या कर ली, इसमें पढ़े लिखे लोग भी शामिल थे। कुछ लोगों ने आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या का सीधा जुडाव मानसिक स्वास्थ्य से है।
मानसिक स्वास्थ्य के नोडल अधिकारी डा. बी.पी. सिंह ने बताया कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से हीन भावना से ग्रस्त है अथवा आत्महत्या करने की सोच रहा है तो वह एक मानसिक बीमारी से ग्रस्त है। मानसिक अस्वस्थता के कारण ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है, उचित परामर्श और चिकित्सा पद्धति के माध्यम से इसका उपचार किया जा सकता है। उन्होने बताया कि आज कोरोना के दौर में आत्महत्या की जो खबरें मीडिया में आई हैं वह इस बात की और इशारा करती हैं कि लोगों में इस बीमारी के प्रति डर बहुत अधिक है तथा बहुत से लोग आर्थिक असुरक्षा से ग्रसित हैं।
-समस्या है तो समाधान भी
मानसिक स्वास्थ्य केन्द्र के क्लीनिकल साइकोलाॅजिस्ट डा. अशोक पटेल का कहना है, जब व्यक्ति अवसादग्रस्त या तनाव में होता हैं तो वह चीजों को वर्तमान क्षण के परिप्रेक्ष्य में देखता है। एक सप्ताह अथवा एक माह के बाद यही चीजें भिन्न रूप में दिखाई देने लगती हैं। जो आत्महत्या करने के बारे में सोचते है, वह मरना नहीं चाहते बल्कि केवल अपनी पीड़ा को मारना चाहते हैं। ऐसे में उन्हें अकेले उस स्थिति का सामना करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अपने परिवार के किसी सदस्य या मित्र अथवा किसी सहयोगी से बात भर कर लेने पर उसका समाधान मिल सकता है। उन्होने बताया कि आत्महत्या प्रवृत्ति वालों की पहचान आसानी से नहीं कर सकते, लेकिन कुछ असमान्य लक्षण से पीड़ितों की मनोस्थिति के बारे में जाना जा सकता है। नींद ना आना, आत्मविश्वास की कमीं, भ्रमित रहना, बहुत कम या ज्यादा खाना व अकेले रहना जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। ऐसी स्थिति में परिवार का योगदान, उनका ख्याल व उपचार महत्वपूर्ण हो जाता है।
-जिले में बढ़ी है आत्महत्या की सोंच
क्लीनिकल साइकोलाॅजिस्ट डा. अशोक पटेल ने बताया कि वर्ष 2017 में जिला मेमोरियल चिकित्सालय में मानसिक स्वास्थ्य केन्द्र खुलने के बाद से वर्ष 2019 तक प्रति वर्ष आत्महत्या के 07 से 08 केस इलाज के लिए आते थे लेकिन वर्ष 2020 में लाॅकडाउन के बाद से अब तक 13 केस सामने आ चुके है जिन्होने या तो आत्महत्या का प्रयास किया या फिर उनके मन में आत्महत्या का विचार आया। इसमें से 05 का इलाज अभी चल रहा है।
-आत्महत्या का ख्याल आये तो नम्बर घुमाएं
मानसिक स्वास्थ्य से सम्बंधित समस्याओं के समाधान हेतु परामर्श के लिए सरकार द्वारा जारी हेल्पलाइन नम्बर 1075, निमहंस (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस) के टोल फ्री नम्बर: 080-46110007 व किरन हेल्पलाइन न. 1800-500-0019 पर सम्पर्क कर सकते हैं।

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