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खास बच्चों की पहली मां बनती हैं यह नर्सें_रिपोर्ट-रवि गुप्त

 

 


- बच्चों पर जी भरकर लुटाती हैं ममता
- नर्सेज डे (12 मई) पर विशेष
श्रावस्ती, 12 मई। जिला अस्पताल के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में विशेष नवजात शिशुओं पर पहले उनकी खास मांएं ही ममता लुटाती हैं। हम बात कर रहे हैं यहां पर तैनात स्टाफ नर्सों की, जो चौबीसों घंटे मां की भूमिका में रहकर नवजातों की देखभाल करती रहती हैं। इन बच्चों की किलकारियां यहां की स्टाफ नर्सों के चेहरों की मुस्कान को बढ़ा देती है। यहां पर वर्तमान में कुल 11 स्टाफ नर्स तैनात हैं। कहने को तो यह यहां पर अपनी ड्यूटी करती हैं, लेकिन यह ड्यूटी कब ममता और अपनत्व में बदल जाती है, इन्हें खुद ही पता नहीं चलता है।
समय से पूर्व जन्म लेने वाले अथवा अस्वस्थ नवजातों को पूरी तरह से स्वस्थ करने की जिम्मेदारी इनके कंधों पर होती है। इन बच्चों के रोने की आवाज सुनकर दौड़ी चली आती हैं, और बच्चों पर जी भरकर प्यार लुटाती हैं। यह नर्सें तब तक मां की भूमिका निभाती हैं, जब तक यह नवजात पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपनी मां के आंचल में नहीं चले जाते हैं। यहां ऐसे बच्चे रखे जाते हैं जिनका जन्म नौ माह से पहले हुआ हो अथवा उनका वजन कम हो। इन नर्सों के सामने इस बात की चुनौती होती है कि समय से पूर्व जन्में बच्चे को किस तरह से स्वस्थ बनाया जाए। संकट की इस घड़ी में उसके साथ उसे जन्म देने वाली मां अथवा परिवार का कोई दूसरा सदस्य भी नहीं होता है। ऐसे में यह नवजातों को ट्यूब फीडिंग, स्पून फीडिंग या फॉर्मूला फीडिंग कराती हैं। यहां के प्रभारी डॉ. इमरान कहते हैं कि इन नर्सों के कामों को बेहद करीब से देखा है। यह अपने दायित्वों को सिर्फ ड्यूटी समझकर नहीं बल्कि एक मां के रूप में पूरा करती हैं।
इस यूनिट की शुरूआत अप्रैल 2016 में हुई थी। अब तक यहां पर 6,112 बच्चे भर्ती किए जा चुके हैं। वर्ष 2019 में यहां पर 1,394 बच्चे भर्ती हो चुके हैं। यूनिट के प्रभारी स्टाफ नर्स रमेश सिंह हैं। यहां पर तैनात मेनका सिंह, पार्वती देवी, हुमा इफ्तदार, योगिता पाठक, रिंकी कनौजिया, आकांक्षा गुप्ता, स्वर्ण लता विश्वकर्मा बच्चों पर जी भरकर ममता उड़ेलती हैं। इसके अलावा यहां पर शैलेंद्र यादव, अजय उपाध्याय, राकेश वर्मा भी इन बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं। महिला स्टाफ नर्सों का कहना है कि इन नवजातों की देखभाल करना एक बड़ी चुनौती होती है। इनकी देखभाल करते करते जुड़ाव बहुत ज़्यादा हो जाता है। बच्चों को तब तक नहीं छोड़ते हैं जब तक उनका वजन 1500 ग्राम से ज़्यादा न हो जाए। इन शिशुओं के साथ जुड़ाव काफी अच्छा लगता है। बच्चे जब कई कई दिन रह लेते हैं तो काफी जुड़ाव हो जाता है। भेजते वक्त मन भर आता है।

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