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गुनाहों से माफी की है आज की रात,घरों में करें इबादत,मुल्क में अमनचैन और बीमारी से निजात की मांगें द

 


आज की रात दुनिया के लिए बहुत बडी रात है ।जहां प्रतिवर्ष शबे बारात की रात मस्जिदों में इबादत की आवाजें आती रहती थी वहीं इसबार कोरोना वायरस COVID19 के कारण पूरी दुनिया के हर धर्म के इबादतगाह लगभग बंद हो गये हैं इसलिए घरों में इबादत करिए,पुरखों के मगफिरत और गुनाहों से माफी मांगने के साथ ही अल्लाहपाक की बारगाह में पूरी दुनिया में फैली इस बीमारी से निजात की भी दुआ करिए । इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से आठवें महीने शाबान की 15 वीं तारीख को शब-ए-बरात के नाम से जाना जाता है। यह रात इबादत के साथ ही दिन में रोजा रखने की तरफ भी इशारा करता है। इस दिन रोजा रखकर इंसान इबादत और कुरआन की तिलावत में गुजार दें और जाने-अंजाने में किए गए गुनाहों का पश्चाताप करते हुए साफ दिल से तौबा करे तो उसके सब गुनाह माफ हो जाते हैं। इस रात में इंसान अपने एक साल के किए गए कार्यों का भी जायजा लेता है।
इस मुकद्दस दिन सूर्यास्त से सूर्योदय तक रहमतों की बारिश होती है। शब-ए-बरात को दिन में रोजा रखने व रात में इबादत करने वालों की हर गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। यह रात को बुजुर्गी, रहमत और बरकत वाली रात है ।
इस रात में कब्रिस्तानों में जाकर दफन लोगों के लिए मुक्ति की दुआ भी की जाती है। एक हदीस में आता है कि शब-ए-बरात की रात नबी मुहम्मद साहब ने मदीने की कब्रिस्तान में जाकर पूर्वजों के लिए बक्शीश की दुआ मांगी थी। इस रात में खुदा फरमाता है कि है कोई बक्शीश मांगने वाला, है कोई रोजी मांगने वाला जिसको मैं रोजी दे सकूं।
क्या कोई मुसीबत जदा है, जिसको मैं मुसीबत से दूर कर दूं। जब बंदा अपने गुनाहों के लिए रोता है और आइन्दा गुनाह न करने की कसम खाता है। तब अल्लाहतआला उसके सब गुनाह माफ कर देते हैं। वहीं जो लोग इस रात को सो कर गुजार देते हैं और इबादत नहीं करते हैं। वह मगफिरत से महरूम हो जाते हैं।
शब-ए-बारात दो शब्दों, शब और बारात से मिलकर बना है।
शब का अर्थ है रात। वहीं बारात का अर्थ बरी होना होता है। मुसलमानों के लिए यह रात बहुत फजीलत की रात होती है। इस दिन विश्व के सारे मुसलमान अल्लाह की अबादत करते हैं। वे दुआएं मांगते हैं और अपने गुनाहों की तौबा करते हैं। रात में मनाए जाने वाले शब-ए-बरात के त्योहार पर कब्रिस्तानों में भीड़ का आलम रहता है। पिछले साल किए गए कर्मों का लेखा-जोखा तैयार करने और आने वाले साल की तकदीर तय करने वाली इस रात को शब-ए-बरात कहा जाता है। इस रात को पूरी तरह इबादत में गुजारने की परंपरा है। नमाज,तिलावत-ए-कुरआन,कब्रिस्तान की जियारत और हैसियत के मुताबिक खैरात करना इस रात के अहम काम हैं ।रात में मुस्लिम इलाकों में शब-ए-बरात की भरपूर रौनक रहती थी जो इसबार गायब रहेगी । इस्लामी मान्यता के मुताबिक शब-ए-बरात की सारी रात इबादत और तिलावत का दौर चलता है। साथ ही इस रात मुस्लिम धर्मावलंबी अपने उन परिजनों, जो दुनिया से रूखसत हो चुके हैं, की मगफिरत की दुआएं करने के लिए कब्रिस्तान भी जाते हैं।लेकिन इसबार कब्रिस्तान जाने के बजाए अपनों घरों पर ही इबादत कर अपने पुरखों की मगफिरत की दुआएं करें और बारगाहे-ईलाही में पूरी दुनिया के लिए दुआ करें कि अल्लाहपाक इस महामारी से पूरी दुनिया को बचाएं और अपनी हिफ्जो अमान में रखें ।बडी बरकत और मगफिरत की ये रात बहुत बडी है इसलिए खूब इबादत करिए ।

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