Home » यू पी/उत्तराखण्ड » संतकबीरनगर-भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुन विभोर हुए श्रोता।

संतकबीरनगर-भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुन विभोर हुए श्रोता।

नन्द घर आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की से गूंज उठा पाण्डालप्रह्लाद जैसा पुत्र हो तो 21 पीढ़ियों का एक...

संतकबीरनगर-भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुन विभोर हुए श्रोता।
Share Post




नन्द घर आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की से गूंज उठा पाण्डाल

प्रह्लाद जैसा पुत्र हो तो 21 पीढ़ियों का एक साथ होता है उद्धार-अजय शास्त्री

संतकबीरनगर। खलीलाबाद के पुरानी सब्जी मंडी स्थित संगम गुप्ता के आवास पर आयोजित नौ दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस की कथा में बृंदावन नाम से पधारे कथा ब्यास अजय कृष्ण शास्त्री ने भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुनाकर मौजूद श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। प्रह्लाद चरित्र की कथा को आगे बढ़ाते हुए कथा ब्यास ने बताया कि हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी नरसिंह भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ। ब्रह्मा जी समेत सभी देवता गण भगवान को शांत कराने का हर सम्भव प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सके। देवताओं ने माता लक्ष्मी का आवाहन किया। लक्ष्मी जी ने भगवान की आरती किया लेकिन भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ। तब देवताओं ने प्रह्लाद से भगवान का क्रोध शांत कराने को कहा। प्रह्लाद जैसे ही भगवान के सम्मुख पहुंचते हैं भगवान का क्रोध शांत हो जाता है और नरसिंह भगवान भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में उठा लेते हैं। भगवान ने स्वयं प्रह्लाद का राज्याभिषेक कराया। प्रह्लाद के आग्रह पर भगवान ने हिरण्यकश्यप की सद्गति किया और कहा कि प्रह्लाद जिस कुल में तुम्हारे जैसा पुत्र हो उसकी 21 पीढ़ियों का एक साथ उद्धार हो जाता है। बाद में भगवान ने हरि का अवतार लिया और गजेंद्र का उद्धार किया। कथा ब्यास ने कहा कि गजेंद्र के पास 10 हजार हाथियों के बराबर बल था। गजेंद्र को अपने बल का अभिमान था। एक दिन गजेंद्र अपने परिवार समेत सरोवर में स्नान कर रहे थे। उसी समय एक मगरमच्छ ने गजेंद्र का पैर पकड़ लिया। गजेंद्र ने अपना पैर छुड़ाने का हर सम्भव प्रयास किया लेकिन कामयाबी नहीं मिली। गजेंद्र ने परिवार के लोगों और अपनी पत्नी से बचाने की गुहार लगाई लेकिन वे सब गजेंद्र को छोड़कर चले गए। आपत्ति के समय धीरज, धर्म, मित्र और पत्नी की परीक्षा होती है। जो विपत्ति में काम आए वही अपना होता है। पूरे एक वर्ष तक युद्ध करने के बाद जब गजेंद्र को लगा कि अब प्राण नहीं बचेंगे तब उन्होंने अपनी सूंड़ मे कमल का फूल लेकर श्री हरि का स्मरण किया। श्री हरि ने गजेंद्र को मुक्त कराकर ग्राह की सद्गति किया। बाद में सागर मंथन के समय भगवान ने कच्छप अवतार लिया और समुद्र मंथन का कार्य सम्पन्न कराया। देवताओं और असुरों में जब अमृत कलश के लिए विवाद बढ़ा तो भगवान ने मोहिनी अवतार लिया और अमृत कलश लेकर देवताओं को इशारा कर दिया। मोहिनी रुपी भगवान ने सागर का अमृत देवताओं को पिलाया और असुरों को अपने रुप जाल में फंसा लिया। एक असुर स्वरभानु ने इस चाल को समझ लिया और देवताओं के बीच बैठ गया। मोहिनी ने उस असुर को भी अमृत पिला दिया। भगवान ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया और अमृत पान कर चुका था जिससे उसका शरीर दो भागों में विभाजित हो गया और वह असुर राहु और केतु के रुप में आज भी जीवित है। उसके प्रभाव से आज भी सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगते रहते हैं। भगवान के बामन अवतार के बाद कथा ब्यास ने भगवान के रामावतार की कथा सुनाई। रामावतार की कथा के बाद द्वापर युग में कंश के अत्याचार और भगवान के कृष्ण जन्म का प्रसंग सुनाकर मौजूद श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। इस मौके पर नन्द घर आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की आदि गीतों पर मौजूद श्रोता झूमने लगे। समूचे पाण्डाल का नजारा मथुरा बृंदावन जैसा प्रतीत होने लगा। इस मौके पर मुख्य यजमान कंतलाल गुप्ता, संगम गुप्ता, शुभम गुप्ता, गोरखनाथ मिश्र, अर्जुनराम त्रिपाठी, राम जियावन द्विवेदी, अमरदीप, जीतनारायण पाण्डेय, संजय पाण्डेय सहित तमाम लोग मौजूद रहे।