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संतकबीर नगर--सूफी निजामुद्दीन साहब के सांतवे उर्स में उमडा जन सैलाब, धर्म गुरूओं ने रखा विचार_रिपोर्ट--नूर आलम सिदीकी

सेमरियावां (संतकबीरनगर)। शनिवार को ब्लॉक के अगया स्थित प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान खतीबुल बराहीन अलहाज...

संतकबीर नगर--सूफी निजामुद्दीन साहब के सांतवे उर्स में उमडा जन सैलाब, धर्म गुरूओं ने रखा विचार_रिपोर्ट--नूर आलम सिदीकी
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सेमरियावां (संतकबीरनगर)। शनिवार को ब्लॉक के अगया स्थित प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान खतीबुल बराहीन अलहाज अश्शाह हजरत मोहम्मद सूफी निजामुद्दीन साहब का सातवां उर्स उनके पैतृक गांव अगया में उनकी खानकाह पर सातवें उर्स मुबारक का आयोजन हुआ इस मौके पर बाद नमाज इशा एक अंतरराष्ट्रीय निजामी कान्फ्रेंस आयोजित की गयी। जिसकी शुरुआत हाफिज व कारी अजीजुर्रहमान की तिलावते कुरआन से हुई। अलाउद्दीन निजामी ने नात व मनकबत पेश किया। जो इस प्रकार से थे- मेरे लब पर है तराना सूफी निजामुद्दीन का, सारा आलम है दिवाना सूफी निजामुद्दीन का। मुस्तफा के इश्क में जबकर दिया खुद को फना, हो गया सारा जमाना सूफी निजामुद्दीन का। कान्फ्रेंस को खिताब करते हुए सज्जादानशीन अल्लामा हबीबुर्रहमान निजामी ने कहा कि खतीबुल बराहीन हजरत सूफी निजामुद्दीन 15 जनवरी 1928 को अगया में पैदा हुए। वालिद बुजुर्गवार ने अपनी मुसर्रत व शादमानी के आलम में दिल में यह तय कर लिया कि मैं अपने इस बच्चे को आलिमे दीन बनाऊंगा। इसलिए आपकी परवरिश खालिस इस्लामी माहौल में हुई। उन्होंने कहा कि हजरत सूफी साहब की प्रारम्भिक शिक्षा अगया मकतब में हुई। जहाँ आपने उर्दू, कुरआन करीम की शिक्षा हासिल की और फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा में मसरूफ हो गये। इसके बाद प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान दारूल उलूम अहले सुन्नत तदरीसुल इस्लाम बसडीला में राबिया तक तालीम हासिल की। फिर 1947 में मदरसा इस्लामिया इन्दरकोट मेरठ में इमामुन नहू हजरत अल्लामा अलशाह सैयद गुलाम जीलानी, हजरत अल्लामा अलहाज मुबीनुद्दीन अमरोहवी से शिक्षा प्राप्त की। सन् 1948 में दारूल उलूम अशरफिया मिस्बाहुल उलूम मुबारकपुर में हजरत अल्लामा अलहाज अब्दुल अजीज मोहद्दिस मुरादाबादी, हजरत अल्लामा मु. सुलेमान भागलपुरी, अल्लामा अलहाज गुलाम जीलानी, हजरत अल्लामा अलहाज अब्दुल मुस्तफा और हजरत अल्लामा हाफिज अब्दुर्रऊफ से शिक्षा हासिल की। साथ ही 16 जनवरी 1951 को ताजदारे अहले सुन्नत आफताबे रूश्दे हिदायत शहजादे आला हजरत सरकार मुफ्ती-ए- आजम के दस्ते हक परस्त पर शर्फे बैयत हासिल किया। सन् 1952 में सनदे फराग और दस्तारे फजीलत से नवाजे गये। उन्होंने कहा कि 15 नवम्बर 1984 को खानकाहे मारहेरा मुतहरा में अहसनुल उलेमा हजरत अल्लामा सैयद शाह मुस्तफा हैदर हसननैन उलेमा एवं मशाएख की मौजूदगी में खतीबुल बराहीन को सिलसिल-ए-आलिया कादिरिया बरकातिया की खिलाफत व इजाजत से सरफराज फरमाया। उन्होंने कहा कि हजरत मौलाना सूफी मुहम्मद निजामुद्दीन ने अपने आपको दूसरे इंसानों से बालातर व मुमताज बनाने या समझाने के लिए कोई नया तरीका ईजाद नहीं किया बल्कि अपनी सादा जिन्दगी व सादगी से लोगों को प्रभावित किया। वह खामूश तबीयत के इंसान थे और कारोबार दुनिया और उसके मशागिल से दूर रहने के आदी नजर आये। वह दीन व दयानत के पाबंद थे वह बड़े आलिमे दीन बड़े अच्छे वाइज व मुकर्रिर थे। उन्होंने कहा कि वह ऐसे सूफी बासफा थे कि मानो आपके ऊपर एक इल्म की चादर ओढ़ा दी गई हो। उलेमा-ए-इकराम की मजलिस में हदीस शरीफ बिना किसी खौफ के बोलते थे जिससे यह लगता था कि इस इल्म का समुन्दर ठेठ मार रहा है। लम्बी लम्बी हदीस बिना रूके सुनाते थे। वह सुन्नते रसूल के पाबंद थे। बेईमानी व बेशर्मी से खुद की हिफाजत की। निजामी कान्फ्रेंस पूरी रात चला। अल्लाह रब्बूल ईज्जत हर दौर में ऐसे ही बुजुर्ग आनेदिन की सख्सियत बख्शता हैं जिससे उस दौर में लोग उस बुजुर्ग आनेदिन की आदतों से रूबरू होकर दुनिया में फैली तमाम बुराइयों से दूर रहकर अल्लाह की रजा की ओर रूजु रहे उसी किरदारें, अखलाक व अम्ल से हजरत सूफी निजामुद्दीन साहब ने बन्देगाने खुदा को अपना दीवाना बना लिया। इस दौरान मौलाना शम्सुल हक अफ्रीका, मौलाना शरफुद्दीन अमेरिका, सुल्तान अहमद हालैंड, अशफाक अहमद म.प्र., अख्तर हुसेन अलीमी, मुफ्ती निजामुद्दीन बरांवशरीफ, मौलाना सईद, मौलाना जियाउल मुस्तफा, कारी अब्दुस्समद निजामी, मौलाना कौसर इमाम रजा, मौलाना कमाल अहमद, मो.नूरानी निजामी आदि ने भी खिताब किया। इस मौके पर ब्लाक प्रमुख मुमताज अहमद, पूर्व जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि शोएब अहमद नदवी, अली असगर, मु. आसिम खां, मुश्ताक अहमद आदि मौजूद रहे। कान्फ्रेंस का संचालन मौलाना इश्तियाक अहमद ने किया। 29 दिसम्बर को नमाजे फजर के बाद खत्म कुरआन शरीफ व हल्का-ए- जिक्र तथा दुुुआ के साथ कान्फ्रेंस संपन्न हुआ।