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गोरखपुर और फूलपुर उप-चुनावों मे बीजेपी की हार के अदृश्य किंतु प्रभावशाली कारणों पर "मन की बात" जिनकी बजह से हारी बीजेपी_अजय श्रीवास्तव_एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात और त्रिपुरा में भाजपा की जीत का श्रेय दिया जा...

👤 Anonymous16 March 2018 2:20 AM GMT
गोरखपुर और फूलपुर उप-चुनावों मे बीजेपी की हार के अदृश्य किंतु प्रभावशाली कारणों पर मन की बात जिनकी बजह से हारी बीजेपी_अजय श्रीवास्तव_एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात और त्रिपुरा में भाजपा की जीत का श्रेय दिया जा रहा था और उन्हें कर्नाटक में पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जा रहा था, वही आदित्यनाथ अपनी लोकसभा सीट को जिताने में असफल रहे,
वहीं, दूसरा चुनाव फूलपुर में था जहां से भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य 52 फीसदी वोट पाकर जीते थे. जिस व्यक्ति ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन चौथाई बहुमत से जिताया और उपमुख्यमंत्री बना, वह अपनी सीट पर पार्टी को नहीं जिता पाया।आश्चर्यजनक इसलिए भी था क्योंकि पिछले तीस सालों के दौरान देश में या राज्य में लहर चाहें किसी भी दल की हो, गोरखपुर में जीत भाजपा की ही होती थी।
पहले 1989 से 1996 तक महंत अवैद्यनाथ सांसद रहे और उसके बाद से 2017 तक उनके शिष्य रहे योगी आदित्यनाथ. उनके समर्थकों ने नारा गढ़ लिया था - यूपी में रहना है, तो योगी-योगी कहना है।

तो आखिर ये अप्रत्याशित नतीजे आए क्यों? इन दोनों सीटों पर भाजपा के तीन से साढे़ तीन लाख वोट कम कैसे हो गए?

हार के कारणों को हम दृश्य और अदृश्य भागो मे विश्लेषित कर रहे है।

दृश्य कारण-

1-गलत कैंडीडेट


विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार योगी ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साफ तौर पर बताया था कि गोरखपुर में केवल गोरखपुर पीठ का व्यक्ति ही जीत सकता है. लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने चुना उपेन्द्र शुक्ला को जो गोरखपुर के क्षेत्रीय अध्यक्ष थे.
गोरखपुर के आसपास के इलाक़े में जगदंबिका पाल को छोड़कर अन्य सभी सांसद ब्राह्मण हैं. ऐसे में एक अन्य ब्राह्मण को चुनाव लड़ाना जातिगत समीकरणों के लिहाज़ से भी ठीक नहीं था।
वैसे भी गोरखपुर में निषाद सहित पिछड़ी जातियां काफ़ी संख्या में हैं. यही वजह है समाजवादी पार्टी ने कभी फूलन देवी को सांसद बनाया था. इसी वजह से सपा के निषाद उम्मीदवार को सजातीय वोट काफ़ी संख्या में मिले।

2-जाति समीकरण

इनका महत्व मुलायम सिंह ने पहचाना था. तभी 1999 में उन्होंने गोरखपुर से गोरख निषाद को उम्मीदवार बनाया था। एक जनसभा में उन्होंने यादवों की भारी संख्या देखकर कहा था - जब यादव, निषाद यहाँ है तो मुसलमान कहां जाएगें?
ऐसे ही फूलपुर में मौर्य अपनी पत्नी को टिकट दिलाना चाहते थे. लेकिन पार्टी इसके लिए तैयार नहीं थी। पार्टी ने कौशलेंद्र सिंह पटेल को टिकट दिया जो स्थानीय नहीं थे जबकि सपा के उम्मीदवार को स्थानीय होने का लाभ मिला.
इलाहाबाद के तीन मंत्रियों - नंद कुमार गुप्ता नंदी, सिद्धार्थ नाथ सिंह और मौर्य में आपस में नहीं बनती है। पटेल इनमें से किसी की भी पसंद नहीं थे। मौर्य ने भले ही 11 दिन फूलपुर में रुककर सौ से ज्यादा सभाएं संबोधित की, लेकिन नतीजा कुछ और निकला. फूलपुर में दलितों और पिछड़ी जातियों की संख्या लगभग सत्तर प्रतिशत है. सपा और बसपा के साथ आने से सभी ने साझा उम्मीदवार को जमकर वोट दिए।

3-नाराज लोग, कार्यकर्ता

वहीं, राज्य सरकार के कामकाज से लोग नाराज थे. एक साल के अंदर राज्य सरकार ने किसानों, छात्रों और बुज़ुर्गों सभी को नाराज किया. बुज़ुर्गों की पेंशन बंद की, छात्रों की स्कॉलरशिप और किसानों की उपज पर चोट की।
इसके अलावा पार्टी का कार्यकर्ता नेतृत्व से नाराज था। नेता उनसे मिलते ही नहीं थे। उनके कोई काम ही नहीं हो रहे थे. इससे संदेश गया कि सत्ता मिलने के बाद नेता मद में चूर हो गए हैं. यही नहीं संगठन का दायित्व संभाल रहे लोग भी कार्यकर्ताओं से कन्नी काचने लगा थे। आखिर कोई भी पार्टी उतनी ही मज़बूत होती है जितनी उसके कार्यकर्ता. यही वजह है कि बीजेपी की हार के जश्न में सपा और बसपा के अलावा कई भाजपा कार्यकर्ता भी शामिल थे।
पार्टी की केंद्रीय और प्रदेश इकाई ने इन चुनावों को कितनी गंभीरता से लिया यह इसी बात से जाहिर है कि न तो मोदी प्रचार के लिए यहाँ गए और न ही अमित शाह। यहाँ तक कि चुनाव के प्रभारी अनूप गुप्ता और शिव नारायण शुक्ला जैसे लाइटवेट लोग बनाए गए थे।से दोनों राज्य इकाई में मंत्री और महामंत्री हैं। इसी से बीजेपी के अंदर ही कई अफ़वाहें गर्म हो गई है।क्या पार्टी योगी और मौर्य का क़द कम करना चाहती थी?

3-गठजोड़

यह कहना सही नहीं होगा कि सपा और बसपा के साथ आने से बीजेपी हार गई. पिछले जो चुनावों में इन दोनों पार्टियों को मिले वोट को जोड़ लिया जाए, तब भी वे बीजेपी उम्मीदवार को नहीं हरा पाते।
गोरखपुर में 2009 में सपा उम्मीदवार मनोज तिवारी (जो अब दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष हैं) को 11 फीसदी वोट मिले थे और बसपा के विनय शंकर तिवारी को 24.4 फीसदी वोट मिले थे. हालांकि दोनों मिल कर भी योगी आदित्यनाथ को हरा नहीं पाते क्योंकि उन्हें लगभग 54 फीसदी वोट मिले थे।
2014 में मोदी लहर के बावजूद योगी को पिछली बार से दो फीसदी वोट कम मिले लेकिन सपा के 22 और बसपा के 17 फीसदी वोटों को मिला दिया जाए तो भी उन्हें हराने में नाकामयाब रहते। यही हालत फूलपुर की भी थी।


अदृश्य कारण-


1- केंद्रीय नेतृत्व पर योगी और मौर्या के कद को कम करने का प्रयास-
यह एक गंभीर आरोप है।जब 1989 से गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से मठ के उम्मीदवार लगातार जीत रहे थे तो इस बार मठ से उम्मीदवार क्यों न ही चुना गया और उम्मीदवार चयन मे योगी आदित्यनाथ की बात क्यों न सुनी गई।इसके अलावा जिन उपेंद्र नाथ शुक्ल को उम्मीदवार बनाया गया ,उनकी कभी आदित्यनाथ से पटी ही न थी।आदित्यनाथ के विरोधी व्यक्ति को टिकट तथा जातीय समीकरण के सामान्य फार्मूले पर ध्यान न देना निश्चित रूप से केन्द्रीय नेतृत्व की जिताने वाली रणनीति नहीं थी।ऐसे मे क्या केन्द्रीय नेतृत्व योगी की प्रभावशाली हिन्दू और स्टार प्रचारक नेता की छबि धूमिल कर उनके दबाव से उबरना चाहती है।हालांकि योगी पर मुख्यमंत्री की सीट हासिल करने मे दबाव के आरोप लगे थे।

यही हाल फूलपुर संसदीय क्षेत्र का है।यहां मौर्या अपनी को लड़ाना चाहते थे जिसमें केशव मौर्या का स्वयं का प्रभाव और जातीय समीकरण दोनों अच्छे थे किन्तु केन्द्रीय नेतृत्व ने एक बाहरी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया जब कि सपा ने स्थानीय उम्मीदवार को तवज्जो दिया और लाभ भी लिया ।इसके अलावा कौशलेन्द्र सिंह पटेल इलाहाबाद के तीनो मंत्रियों नंदी, सिद्धार्थ नाथ सिंह और मौर्या मे से किसी की पसंद नही थे।अत: ऐसे मे उम्मीदवार चयन मे जानबूझकर जिताउ उम्मीदवार का चयन न किया जाना केंद्रीय नेतृत्व पर बडा आरोप मढा जा सकता है।

योगी और केशव पर भी आरोप-

2014 लोकसभा चुनाव मे भाजपा इन दोनों सीटों से बड़े अंतरो से जीत दर्ज की थी और पार्टी इन सीटों पर कांग्रेस, सपा, बसपा के उम्मीदवारों के कुल वोटों ज्यादा वोट पायी थी।अचानक वोटों की इतनी गिरावट कैसे?
सबसे पहले गोरखपुर की चर्चा करते है।गोरखनाथ धाम बूथ पर पार्टी को मात्र 43 वोट कैसे? स्पष्ट है कि
मठ और उसके आस पास के लोग उम्मीदवार के साथ नहीं थे।इसमेँ यह भी कहा जा रहा है कि योगी ने जिताने मे जोर न लगाया और उनकी हिन्दू युवा वाहिनी भी निष्क्रिय रही।यह भी बात की जा रही कि वे कभी नहीं चाहेंगे कि गोरखपुर की संसदीय राजनीति मे उनके विकल्प के तौर पर मठ से बाहर के किसी व्यक्ति की जमीन बने।मठ ने कमलनाथ का नाम उम्मीदवार के रूप मे प्रस्तावित किया था।

इसी प्रकार का आरोप केशव मौर्या पर भी लगे है कि वे फूलपुर को अपनी व्यक्तिगत सीट बनाने की कोशिश मे रहे है इलाहाबाद के शीर्ष भाजपा नेता भी किसी बाहरी व्यक्ति के प्रभाव बढऩे से असहज थे

बहरहाल, अब एक बात बिल्कुल साफ़ हो गई है कि गोरखपुर में चुनावी हार के बाद योगी आदित्यनाथ अब उस तरह से बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव की रणनीति नहीं बना पाएंगे।
हिंदुत्व की राजनीति के चेहरे के तौर पर उनकी पहचान को धक्का लगा है जिसे उनके नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर उभर पाने की उम्मीदों को झटका लगा है।

हालांकि चुनाव में हार के बाद प्रेस कांफ्रेंस में योगी आदित्यनाथ का मुरझाया हुआ चेहरा बता रहा था कि इस हार ने उनके क़द को कम कर दिया।जो शायद केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति थी।

अगर भाजपा मे अंदरूनी घमासान की स्थिति आगे भी रही तो पार्टी को एक बार पुनः प्रदेश की राजनीति मे हाशिए पर जाना पड़ सकता है क्योंकि पूर्व मे पार्टी को सरकार बनाने की स्थिति से हाशिए पर लाने मे बीजेपी की आंतरिक कलह सबसे ज्यादा जिम्मेदार थी ।