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एक साथ चुनाव के फायदे और नुकसान पर मन की बात-मेरे साथ_अजय श्रीवास्तव_एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव

आजादी के बाद शुरुआती सालों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे. हालांकि, इसके लिए...

👤 Anonymous2 Feb 2018 11:05 AM GMT
एक साथ चुनाव के फायदे और नुकसान पर मन की बात-मेरे साथ_अजय श्रीवास्तव_एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव
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आजादी के बाद शुरुआती सालों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे. हालांकि, इसके लिए कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं.. थी. लेकिन सुविधा के नाते 1952 के पहले आम चुनाव के साथ ही राज्यों की विधानसभा के लिए भी चुनाव हुए थे. तकरीबन 15 साल तक विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ चले लेकिन बाद में यह चक्र गड़बड़ा गया. क्योंकि कुछ राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला और कुछ सरकारें अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले गिर गईं. अब एक बार फिर से दोनों चुनाव एक साथ कराने की बात चल रही है तो इसके फायदों को समझना प्रासंगिक हैः
(1) राजनीतिक स्थिरता-
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का सबसे बड़ा फायदा यही बताया जा रहा है कि इससे राजनीतिक स्थिरता आएगी. क्योंकि अगर किसी राज्य में कार्यकाल खत्म होने के पहले भी कोई सरकार गिर जाती है या फिर चुनाव के बाद किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तो वहां आनन-फानन में नहीं बल्कि पहले से तय समय पर ही चुनाव होगा. इससे वहां राजनीतिक स्थिरता बनी रहेगी.
पांच साल तक किसी राज्य को अपनी विधानसभा के गठन के लिए इंतजार नहीं करना पड़े, इसके लिए यह सुझाव दिया जा रहा है कि ढाई-ढाई साल के अंतराल पर दो बार चुनाव हों. आधे राज्यों की विधानसभा का चुनाव लोकसभा के साथ हो और बाकी राज्यों का इसके ढाई साल बाद. अगर बीच में कहीं कोई राजनीतिक संकट पैदा हो और चुनाव की जरूरत पड़े तो वहां फिर अगला चुनाव ढाई साल के चक्र के साथ हो. विधि आयोग ने 1999 में अपनी 117वीं रिपोर्ट में राजनीतिक स्थिरता को ही आधार बनाकर दोनों चुनावों को एक साथ कराने की सिफारिश की थी.
(2)चुनावी खर्च और अन्य संसाधनों की बचत-
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे चुनावी खर्च में काफी बचत होगी. केंद्र सरकार की ओर से यह कहा जा रहा है कि दोनों चुनाव एक साथ कराने से तकरीबन 4,500 करोड़ रुपये की बचत होगी.
बचत की बात भी कई स्तर पर की जा रही है. अगर दोनों चुनाव एक साथ हों तो मोटे तौर पर सरकार का यह काम एक ही खर्च में हो जाएगा. उसे अलग से चुनाव कराने और सुरक्षा संबंधी उपाय नहीं करने होंगे. एक ही बार की व्यवस्था में दोनों चुनाव हो जाएंगे और इससे संसाधनों की काफी बचत होगी. सुरक्षा बलों को भी बार-बार चुनाव कार्य में इस्तेमाल करने के बजाए उनका बेहतर प्रबंधन करके जहां उनकी अधिक जरूरत हो, वहां उनका इस्तेमाल किया जा सकेगा. अगर एक साथ चुनाव होते हैं तो राजनीतिक दलों को भी दो अलग-अलग चुनावों की तुलना में हर स्तर पर कम पैसे खर्च करने होंगे. इन पार्टियों के स्टार प्रचारक एक ही सभा से दोनों चुनावों का चुनाव प्रचार कर सकेंगे. इससे हेलीकाॅप्टर से लेकर सभा कराने तक, कई तरह के खर्च कम होंगे.
(3)प्रशासन को सुविधा-
एक साथ चुनाव होने से कई स्तर पर प्रशासकीय सुविधा की बात भी कही जा रही है. अलग-अलग चुनाव होने से अलग-अलग वक्त पर आदर्श आचार संहिता लगाई जाती है. इससे होता यह है कि विकास संबंधित कई निर्णय नहीं हो पाते हैं. शासकीय स्तर पर कई अन्य कार्यों में भी इस वजह से दिक्कत पैदा होती है. जानकारों के मुताबिक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से प्रशासनिक स्तर पर चुनावों की वजह से होने वाली असुविधा कम होगी और शासन तंत्र और प्रभावी ढंग से काम कर पाएगा.
(4)आम जनजीवन में कम अवरोध-
जब भी चुनाव होते हैं, आम जनजीवन प्रभावित होता है. चुनावी रैलियों से यातायात पर असर पड़ता है. कई तरह की सुरक्षा बंदिशों की वजह से भी आम लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में अगर बार-बार होने वाले चुनावों के बजाय एक बार में दोनों चुनाव होते हैं तो इस तरह की दिक्कतें कम होंगी और आम जनजीवन में अपेक्षाकृत कम अवरोध पैदा होगा.
भागीदारी बढ़ सकती है
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में यह बात भी कही जा रही है कि इससे चुनावों में आम लोगों की भागीदारी भी बढ़ सकती है. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि देश में बहुत से लोग हैं जिनका वोटर कार्ड जिस पते पर बना है, वे उस पते पर नहीं रहते बल्कि रोजगार या अन्य वजहों से दूसरी जगहों पर रहते हैं. अलग-अलग चुनाव होने की वजह से वे अपनी मूल जगह पर मतदान करने नहीं जाते. लेकिन कहा जा रहा है कि अगर एक साथ चुनाव होंगे तो इनमें से बहुत सारे लोग एक बार में दोनों चुनाव होने की वजह से मतदान करने अपने मूल स्थान पर आ सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो चुनावों में मत प्रतिशत और दूसरे शब्दों में आम लोगो की राजनीतिक भागीदारी बढ़ सकती है।
धन की बरबादी के कारण एक साथ चुनाव के लिए जनमत तो बन रहा है किन्तु इस व्यवस्था के नुकसान भी कम नही है।
(1) जनता के प्रति जवाबदेही कम होना-
लोकतंत्र को जनता का शासन कहा जाता है. ऐसे में भारत में जिस तरह की संसदीय प्रणाली अपनाई गई है उसमें अलग-अलग वक्त पर होने वाले अलग-अलग चुनाव एक तरह से जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच लगातार जवाबदेह बने रहने के लिए मजबूर करते हैं. कोई भी पार्टी या नेता एक चुनाव जीतने के बाद निरंकुश होकर इसलिए नहीं काम कर पाता कि उसे छोटे-छोटे अंतराल पर किसी न किसी चुनाव का सामना करना पड़ता है.
जानकारों के मुताबिक ऐसे में अगर दोनों चुनाव एक साथ होते हैं तो राजनेताओं और पार्टियों पर से यह अंकुश हट जाएगा. एक बार चुनाव होने के बाद वे पांच साल के लिए जनता के प्रति किसी जवाबदेही से निश्चिंत हो जाएंगे. इसलिए कइयों को एक साथ चुनाव होने से सरकारों, पार्टियों और नेताओं की जनता के प्रति जवाबदेही कम होने की आशंका सता रही है।
(2) क्षेत्रीय एजेंडे पर राष्ट्रीय एजेंडे का दबदबा-
लोकसभाऔरविधानसभा चुनावों के एक साथ होने का एक बड़ा संकट यह भी है कि क्षेत्रीय एजेंडे पर राष्ट्रीय एजेंडा हावी हो सकता है. अभी की स्थिति यह है कि लोकसभा चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं. इनमें वोट मांगते वक्त और वोट देते वक्त राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को अधिक तवज्जो दी जाती है. वहीं विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय मुद्दे हावी रहते हैं. पूरा चुनाव अभियान इन्हीं मुद्दों के आसपास घूमता है.
ऐसे में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते हैं तो इस बात की आशंका रहेगी कि क्षेत्रीय मुद्दे कहीं गुम न हो जाएं. ऐसे में राष्ट्रीय पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर जो चुनाव अभियान चलाएंगी उसका कलेवर वे एक तरह का रखना चाहेंगी ताकि पूरा अभियान हर जगह प्रभावी हो. इसमें क्षेत्रीय मुद्दों के लिए जगह बना पाना मुश्किल होगा.
क्षेत्रीय पार्टियों के लिए संकट
क्षेत्रीय एजेंडे पर राष्ट्रीय एजेंडे के हावी होने का खतरा कई लोग यह भी मान रहे हैं कि क्षेत्रीय पार्टियों के लिए चुनाव में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं और नई चुनावी व्यवस्था राष्ट्रीय पार्टियों के लिए अधिक अनुकूल हो सकती है. ऐसे में राजनीतिक दलों की विविधता कम हो सकती है. आम तौर पर राज्यों में क्षेत्रीय दल वहां की जरूरतों के हिसाब से खास मुद्दों को लेकर खड़े होते हैं. ऐसे में अगर क्षेत्रीय दल कमजोर होंगे तो स्थानीय मुद्दों को नई व्यवस्था में प्राथमिकता मिलने की संभावना कम हो जाएगी।क्षेत्रीय दलों के सामने दूसरा संकट संसाधनों का होगा. एक साथ चुनाव होने की स्थिति में राष्ट्रीय पार्टियां अपना चुनाव अभियान राष्ट्रीय स्तर पर चलाने के लिए जितने संसाधन झोंकेंगी, उनकी बराबरी कर पाना क्षेत्रीय पार्टियों के बस का नहीं है. इस वजह से कहीं न कहीं राष्ट्रीय पार्टियों से मुकाबला करने की क्षेत्रीय पार्टियों की क्षमता पर असर पड़ेगा.
(3)चुनावों के व्यक्ति केंद्रित होने की आशंका-
लोकसभा औरविधानसभा चुनाव एक साथ होने का एक नुकसान यह भी बताया जा रहा है कि चुनाव अभी से ज्यादा व्यक्ति केंद्रित हो जाएंगे. लोकसभा का चुनाव एक साथ होने की वजह से राष्ट्रीय पार्टियां प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव में जा सकती हैं और ऐसे में पूरा चुनावी अभियान उस व्यक्ति के आसपास केंद्रित रह सकता है।अभी भी यह होता है. लेकिन अगर लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा के चुनाव भी होते हैं तो इस तरह के चुनावी अभियान का असर विधानसभा चुनावों के मतदान पर भी पड़ेगा और इन चुनावों में भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण व्यक्ति केंद्रित हो सकता है. जानकारों के मुताबिक ऐसे में संभव है कि लोग जिस व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाह रहे हों, उसी की पार्टी के पक्ष में वे विधानसभा चुनावों के लिए भी वोट कर दें.
(4)स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने का पेंच-
लोकसभा औरविधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सबसे बड़ा पेंच यह है कि अगर किसी राज्य में विधानसभा त्रिशंकु बनी तो उस स्थिति में क्या होगा. क्या उस राज्य में फिर से चुनाव होगा? या फिर उस राज्य को अगले पांच साल तक विधानसभा चुनाव के लिए इंतजार करना पड़ेगा? कहा यह भी जा रहा है कि सभी विधानसभा चुनावों को ढाई-ढाई साल के अंतराल पर दो हिस्से में बांटा जाएगा. अगर ऐसा होता है तो त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में क्या उस राज्य को अगले ढाई साल तक अगले विधानसभा चुनाव के लिए इंतजार करना पड़ेगा?
जिन विकल्पों का जिक्र यहां किया गया है, इनमें से कोई भी विकल्प अपनाया गया तो उसमें काफी जटिलताएं हैं और नई व्यवस्था मौजूदा व्यवस्था से कम से कम इस मोर्चे पर कम जटिल नहीं होगी. इन्हीं जटिलताओं का सामना तब भी करना पड़ेगा जब किसी राज्य की सरकार या केंद्र सरकार अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले किसी राजनीतिक वजह से गिर जाए. ऐसी स्थिति में क्या होगा, इस बारे में भी अभी स्पष्टता नहीं है।