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बसपा की हार पर महामंथन-बेहतरीन वोटिंग प्रतिशत के बाबजूद क्यों हारी बसपा_मन की बात-मेरे साथ_अजय श्रीवास्तव_एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव_यूपी/उत्तराखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय वेब न्यूज़ पोर्टल

1982 से चुनावों मे प्रयोग मे की जा रही ईवीएम पर विभिन्न चुनावों मे लगभग सभी राजनीति दलों एवं...

👤 Ajay2017-03-19 13:03:34.0
बसपा की हार पर महामंथन-बेहतरीन वोटिंग प्रतिशत के बाबजूद क्यों हारी बसपा_मन की बात-मेरे साथ_अजय श्रीवास्तव_एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव_यूपी/उत्तराखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय वेब न्यूज़ पोर्टल
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1982 से चुनावों मे प्रयोग मे की जा रही ईवीएम पर विभिन्न चुनावों मे लगभग सभी राजनीति दलों एवं उसके नेताओं द्वारा बारी-2 उल्टे- सीधे आरोप मढ़े गये है और मायावती के आरोप को भी इन्हीं आरोपों की श्रृंखला मे से एक माना जाना चाहिये न, कि इसको गंभीरता से लेने की जरूरत है क्योंकि निर्वाचन आयोग के अलावा देश-विदेश के तमाम विशेषज्ञों ने भी ईवीएम मे किसी भी पक्षीय गड़बड़ी को प्रायोगिक रूप से असंभव बताया है। अत: मायावती द्वारा बसपा की हार को ईवीएम पर दोषारोपण ,हार के वास्तविक कारणों को जनता और अपने समर्थकों से छुपाने का प्रयास है।2007 मे इसी ईवीएम से बसपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा सभा चुनावों मे अप्रत्याशित जीत हासिल भी कर चुकी है साथ ही लोकसभा चुनाव 2014 की तुलना मे इस चुनाव मे बसपा के वोट प्रतिशत मे वृद्धि भी देखी जा सकती है। अत : बसपा की चुनावी हार के कारणों पर मेरा विश्लेषण इस प्रकार से है-

प्रथम कारण: पार्टी के उद्देश्य व स्वरूप मे परिवर्तन

बसपा अपने जन्म के समय राजनीतिक पार्टी से ज्यादा एक सामाजिक न्याय का आंदोलन थी लेकिन आज के चुनावी राजनीति मे यह इतना उलझ गई कि पार्टी का स्वरूप एक व्यक्ति के निजी स्वामित्व वाली कंपनी के समान हो गयी है। सही अर्थो मे आज मायावती ही बसपा हैं और बसपा ही मायावती हैं। आरएसएस की तरह बसपा को जमीनी स्तर पर मजबूत करने वाले बामसेफ संगठन को पार्टी नेतृत्व की उपेक्षा ने पहले ही खत्म कर दिया था साथ ही साथ नेतृत्व स्तर पर पार्टी के जनाधार बढ़ाने वाले संगठनों जैसे महिला संगठन ,युवा संगठन, विद्यार्थी संगठन आदि पर कभी ध्यान ही नही दिया गया। इसके अलावा सामाजिक न्याय आंदोलनों के प्रति उदासीनता ने पार्टी और उनके समर्थकों के संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न कर दी है।अतःअपने आधारभूत जनाधार खोती जा रही पार्टी के लिए चुनाव मे जीत एक दुष्कर कार्य है।


दूसरा कारण: स्वयं मायावती

बसपा मायावती के नेतृत्व मे लगातार तीसरा चुनाव हारी, लेकिन मायावती ने हार के वास्तविक कारणों को विश्लेषण कर न तो रणनीतिक बदलाव लाने की कोशिश की और न, ही सांगठनिक स्तर पर स्फूर्ति व जोश बढ़ाने वाले राजनैतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों का प्रायोजन की। साथ ही साथ 2012 मे विधानसभा चुनाव मे हार के बाद मायावती लगभग उत्तर प्रदेश मे अनुपस्थित रहीं, राज्यसभा मे बैठ प्रदेश की राजनीति कहीं से भी व्यवहारिक नही है। उत्तर प्रदेश मे प्रमुख विपक्षी दल होते हुए भी बसपा ने मजबूत नेतृत्व के अभाव मे सरकार की नीतिगत कमियों को उजागर करने मे असफल होने के साथ-2 स्वयं की उपस्थिति भी दर्ज कराने मे असफल रही। अत: केवल विधानसभा चुनावों मे केवल कुछ रैलियां कर सरकार बनाने के सपने देखना , स्वयं को परिणाम पूर्व तक गलतफहमी रखने जैसा है।


'दलित नहीं दौलत की बेटी, टिकट बेचने का आरोप,पार्टी मे मायावती की तानाशाही आदि का मायावती द्वारा विपक्षी दलो को यथेष्ट जबाब न देकर ,नोटबंदी का विरोध करना( जिसको जनता के अधिकांश भाग द्वारा तत्कालीन परिस्थितियों मे भले ही अबोध रूप मे, स्वीकृति मिला) आदि ने मायावती का जनता के बीच गलत छवि बनाया, जो आवारा वोटों (बहते वोटो) को बसपा को मिलने से रोका।
तीसरा कारण: बागी दिग्गजों का पार्टी छोड़ना
बाबूराम कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य, बृजेश पाठक जैसे दिग्गज नेताओं का पार्टी छोड़ना बसपा के लिए दोहरा नुकसानदायक रहा। ये नेता बसपा के दूसरी कतार के नेता होने के साथ-2 इनका स्वयं का जनाधार भी था। केशव मौर्य का भाजपा अध्यक्ष बनना और स्वामी प्रसाद का भाजपा मे जाना, बसपा को एक जाति विशेष के वोट से पूरी तरह से बंचित कर दिया
चौथा कारण: पुराना फार्मूला हुआ फेल
पार्टी संस्थापक कांशीराम ने बसपा आंदोलन के प्रथम चरण मे अति पिछड़े, पिछड़े और मुसलमानों को जोड़ने का प्रयास किया था किन्तु आधार तल पर पिछड़ों एवं दलितों के बीच आर्थिक टकराव के कारण यह प्रयोग लंबे समय तक सफल नहीं रहा, लेकिन फिर भी अति पिछड़े और मुस्लिम वोटों का एक छोटा प्रतिशत बसपा को मिलता रहा। मायावती ने पिछड़े वर्गों के मतो मे अपने लिए कम संभावना को देखते हुए टिकट वितरण मे तथाकथित 'सोशल इंजीनियरिंग' का सहारा लिया और 2007 मे यह सफल भी रहा, किन्तु उसके बाद यह फार्मूला औंधे मुंह गिरा ।
पांचवां कारण: अति दलितों की अनदेखी
30 वर्षों के बहुजन आंदोलन की प्रक्रिया मे प्रदेश की तकरीबन 60 अति दलित जातियों को न तो आवाज़ मिली और न पहचान। लालबत्ती और सत्ता तो दूर की बात रही। इसको देखते हुए आरएसएस ने अपने सामाजिक समरसता अभियान के तहत इन्हें भाजपा से जोड़ा और बसपा के बुनियादी वोटो मे सेंध लगा दी।

छठा कारण: समाज के स्वरूप मे परिवर्तन
नई आर्थिक नीति का विस्तार, बाजार का फैलाव, उपभोक्तावादी समूहों का विकास तथा रूपये की त्वरित आवाजाही,जो विशेष कर यूपीए एवं बीजेपी शासन मे बढ़ी ,जिसने उत्तर प्रदेश के गांवों और शहरों के स्वरूप को बदलने का कार्य किया। अच्छे जीवन की चाह,सुख सुविधा और क्रय की शक्ति बढ़ी। टीवी, मोबाइल, इंटरनेट शहरों मे फैले ही, गावों में भी इसका आश्चर्य जनक रूप से प्रसार हुआ। इस आकांक्षा परक समाज की बदलती चाहतों और मनोवृत्तियों बसपा समझ नही पायी और पारंपरिक अस्मिता परक गोलबंदी पर ही केंद्रित रही।
दलितों मे भी एक मध्य वर्ग विकसित हो चुका है जो सेल्फी खींचता है जो फेसबुक, ट्विटर और प्रिंट मीडिया मे भी अपनी राजनीति की मौजूदगी चाहता है। बसपा अपने ऐसे सामाजिक ओपिनियन मेकर वर्ग से कोई संवाद नही कर पायी।

सातवाँ कारण: दूसरी कतार के नेताओं का अकाल
सतीश चन्द्र मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दीकी को छोड़ कोई और नामी नेता बसपा मे नही बचा है साथ ही साथ उपरोक्त दोनों नेताओं का अपना कोई जनाधार भी नही है। पार्टी कार्यक्रमों और छोटे- मोटे सामाजिक-राजनैतिक आंदोलन के लिए दूसरी कतार के नेताओं की कमी बसपा को जमीनी कार्यकर्ताओं से दूर रखने का कार्य किया।

आठवां कारण: ध्रुवीकरण
भाजपा का हिन्दू ध्रुवीकरण बसपा के दलित-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर भारी पड़ा। सामान्य रूप से मुस्लिम वोट प्रायः भाजपा के विरुद्ध ही पड़ते रहे लेकिन सपा-बसपा दोनों ने मुस्लिम कार्ड खेल कर भाजपा को फायदा पहुंचाने का कार्य किया। साथ ही भाजपा ने जातीय समीकरण पर भी ध्यान दिया और पटेल, कुर्मी, कुशवाहा ,मौर्य जैसी पिछड़ी जातियों के अलावा भुर्जी, चौरसिया, निषाद, तेली जैसी अति पिछड़ी जातियों और अति दलितो के वोटों का जातीय एवं हिन्दुत्व परक ध्रुवीकरण किया।
चुनाव मे युवा वोटर प्राय:' बहते वोटर' होते है। इनको लुभाने के लिए प्रायः जोशीले नारो की आवश्यकता होती है, जो बसपा ने कभी करने की कोशिश ही नहीं की, वहीं भाजपा ने राष्ट्रवाद ,देशभक्ति सहित जोशीले नारो की भरमार लगा दी, जो नवयुवक वोटरों को भाजपा की ओर आकृष्ट मे मील का पत्थर साबित हुई।
नवां कारण: सवर्ण बनाम हरिजन एक्ट
2007-12 बसपा सरकार के समय इस एक्ट के दुरूपयोग ने 2007 मे सोशल इंजीनियरिंग द्वारा बसपा से जुड़ा सवर्ण वर्ग ने खुद को ठगा सा महसूस किया और बसपा से किनारा कर लिया। अत: केवल कुछ सवर्णों को कुछ विधानसभा का टिकट देकर सवर्णों का वोट लेने की मायावती की रणनीति 'काठ की हांडी' साबित हुई।
दसवां कारण: मीडिया प्रबंधन का अभाव व सोशल मीडिया से दूरी
कुशल मीडिया प्रबंधन का अभाव और आज के इस नए दौर में भी सोशल मीडिया से दूरी बीएसपी की हार का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है. एक ओर जहां बीजेपी और उसके नेता अपनी एक खास टीम के जरिये एक सोची समझी नीति व रणनीति के तहत जनसभाओं व रोड शो जैसे पारम्परिक जनसंचार के माध्यमों को अपनाया, वहीं टीवी, रेडियो, न्यूजपेपर, न्यूजपोर्टल्स, फेसबुक, टि्वटर व व्हाट्सएप्प के जरिये अपने पार्टी के कार्यक्रमों व संदेश लगातार आम जनता तक पहुंचाकर खुद को यूपी की जनता का सबसे बड़ा हितैषी साबित किया. जबकि बीएसपी सुप्रीमो मायावती अपने पुराने ढर्रे के तहत सिर्फ जनसभाओं, प्रेसवार्ता और प्रेस रिलीज तक ही सीमित रह गई.

ग्यारहवां कारण :मोदी सरकार की गरीब परक योजनायें
एलपीजी कनेक्शन, जनधन योजना, गरीब कल्याण योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना आदि ने गरीबो और दलितों मे भाजपा के प्रति सकारात्मक माहौल का निर्माण करने मे उत्प्रेरक का कार्य किया, जो अन्ततः वोट मे परिवर्तित हुआ।

उपरोक्त ग्यारह कारणों से हारने वाली बसपा के पास वापसी करने की सम्भावनाएं फिलहाल नजदीक भविष्य ने दिखाई नहीं दे रही है, कोई चमत्कारिक प्रदर्शन ही बसपा को पुनः उत्तर प्रदेश में मजबूत कर सकता है वो भी तब जब मौजूदा सरकार जन आकांच्छावो पर खरा नही उतरेगी तब !