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संतकबीरनगर:- यूपी में राजनैतिक दगाबाजों को मिला कड़ा सबक- भुलावे में नहीं आते सजग मतदाता- जातिवाद और डर के कारोबारियों को लगा तगड़ा झटका_वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा का नजरियां

संतकबीरनगर:- यूपी का चुनाव खत्म हो चुका है और जनता के जबरदस्त समर्थन से नई बनी सरकार बस छितिज पर...

👤 Ajay2017-03-16 16:01:08.0
संतकबीरनगर:- यूपी में राजनैतिक दगाबाजों को मिला कड़ा सबक- भुलावे में नहीं आते सजग मतदाता- जातिवाद और डर के कारोबारियों को लगा तगड़ा झटका_वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा का नजरियां
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संतकबीरनगर:- यूपी का चुनाव खत्म हो चुका है और जनता के जबरदस्त समर्थन से नई बनी सरकार बस छितिज पर उभरने ही वाली है। जो जीते वे आगे बढ़ने की ओर हैं जबकि जो हारे वे " अंगनवा टेंढ़ " वाली कहावत को ताकत देते दिख रहे हैं। जो चीज सबको साफ दिख रही है, उसे देखने से ये उलूक क्यों असफल हैं बस यही बात इनकी समझ की पोल खोल रही है।
यूपी ने सपा के युवराज को अपने दम पर पार्टी का महाराज बनते देखा। लगभग साल भर से युवराज की विरुदावली गाते तमाम चारण, भाटों की कर्ण कटु प्रचार वाणी को बरदाश्त किया। युवा सीएम को पूरे प्रदेश के लोगों ने लखनऊ आगरा हाई वे और लखनऊ के अब तक अदृश्य मेट्रो प्रोजेक्ट की लगातार बार बार बड़ाई करते करते वे इन्ही दो उपलब्धियों में उलझे रहे। पूरे प्रदेश के अधिकांश यदुवंशियों ने भी पूरे दम से अखिलेश जी का प्रचार किया और कहो दिल से अखिलेश फिर से का पूरे समय दिल से जाप भी किया नोटबंदी के विरोध में सपा ने पूरी ताकत झोंकी और मुस्लिमों को अपनी ओर खीचने के लिए कांग्रेस के हाथ में साइकिल की मुठिया भी थमाई। पूरे चुनाव के दौरान बसपा और बुआ जी के प्रति साफ्ट कार्नर जताया। लेकिन नतीजों ने सपा और ' ' बबुआ ' की रणनीति और राजनीति की विफलता को सबके सामने ला दिया। अखिलेश जी को लग रहा था कि उनकी योजनाओं से फायदा लेने वाले ही उनकी नैया पार कर देंगे। लेकिन अब जबकि हार सपा के गले में हार की तरह झूम रही है तो आत्म चिंतन के बदले ' बबुआ ' ईवीएम के मत्थे सारा दोष मढ़कर छुट्टी पा लेना चाहते हैं। सच तो यह है कि जनता को उनके कार्यकाल में प्रशासनिक अव्यवस्था, खुले आम भ्रष्टाचार, जबरदस्त कमीशन खोरी और एक जाति विशेष की खुली धींगामुश्ती कतई पसंद नहीं थी। योजनाओं में पात्रों के चयन में पहला मानक यादव या मुस्लिम होना तो था लेकिन उन्हें भी साहबों की खुशी और राजीनामा खरीदना पड़ता था । सपा सरकार की समाजवादी पेंशन और केंद्र की उज्जवला योजना के क्रियान्वयन के अंतर ने लोगों के विकल्प सिकोेड़ दिए। राज्य सरकार की हर योजना पर कमीशन का ग्रहण था और जब जब किसी नें इन योजनाओं के गुंण गाए तो सबको लगी भ्रष्टाचार की खरोचों से पस बहने लगा था। पूरे प्रदेश में कहीं भी योजनाओं के लाभार्थियों की सूची नहीं मिली जबकि गाइड लाइन चीख चीख कर लाभार्थियों की सूची को सार्वजनिक किए जाने की बात कह रही थी।
सबसे बड़ा झटका सपा को उसके डर के कारोबार के फेल होने से लगा। इस बार मुस्लिम हितैषी की उसकी छवि को बसपा नें जबरदस्त चुनौती दी। मुस्लिम कम डरे और उनको बसपा की छांव भी दुविधा में डालने वाली नजर आई। नतीजा यह हुआ कि सपा के मुस्लिम मतों के कारोबारी इस बार दीवालिया हो गए। अंतिम सबसे बड़ी भूल सपा में मुलायम और शिवपाल के पर कतरने की लगातार चली मुहिम रही। जनता में मुलायम और शिवपाल को बेबस बनाने की मुहिम ने दर्द और खीज पैदा की और चालीस साल से ज्यादा उम्र वालों के साथ बुजुर्गों का गुस्सा सपा पर भारी पड़ा। सपा ने कांग्रेस को १०५ सीटें यह सोच कर दी कि कांग्रेस का दस फीसदी का वोट शेयर उसे दमदार बनाएगा लेकिन ' ना खुदा ही मिला न विसाले सनम, ना इधर के हुए ना उधर के रहे ' की कहावत एक बार और सच हुई। कोढ़ में खाज यह भी कि सपा के बबुआ अपनी बुआ की बात , कि हार ईवीएम ने कराई, को हार के बाद लगातार जप रहे हैं। सपा इस बार चुनाव नहीं साख हारी है। चुनाव ने उस पर लगे एक खास जाति के ठप्पे को जबरदस्त ढंग से उकेरा है। सपा इस चुनौती से उबरने की मंशा दिखाने के बदले अभी यादवी कलह से जूझेगी यह आसार साफ नजर आ रहे हैं।