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सपा की हार पर महामंथन- क्या रहे वो प्रमुख कारण जिसके चलते सपा को मिली बड़ी हार-पढ़े पूरी खबर-"मन की बात"- अजय श्रीवास्तव-एडिटर इन चीफ-सत्यमेव जयते लाइव वेब पोर्टल न्यूज़

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव मे ऐतिहासिक जीत दर्ज की और अपने सहयोगी दलों के...

👤 Ajay2017-03-13 12:42:25.0
सपा की हार पर महामंथन- क्या रहे वो प्रमुख कारण जिसके चलते सपा को मिली बड़ी हार-पढ़े पूरी खबर-मन की बात- अजय श्रीवास्तव-एडिटर इन चीफ-सत्यमेव जयते लाइव वेब पोर्टल न्यूज़
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भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव मे ऐतिहासिक जीत दर्ज की और अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 403 विधानसभा सीटों मे से 325 सीट जीत कर एक रिकार्ड बना डाला। लेकिन पांच सालों से सरकार चला रही समाजवादी पार्टी ने क्या इतना बुरा शासन- प्रशासन का राज चलाया कि पार्टी सीधे 224 से सीटो से मात्र 47 सीटों पर ही सिमट गयी। सपा के खिलाफ यदि हम मौलिक चुनावी मुद्दों पर गौर करें उनमें परिवारवाद,जातिवाद, मुस्लिम तुष्टीकरण आदि विपक्षी पार्टियों द्वारा उछाले गये किंतु इस प्रकार के आरोप तो सपा के जन्म से ही उस पर लगते रहे है और सपा भी यादववाद और एमवाई फैक्टर को खुलेआम चुनावी मुद्दे बनाने से कभी गुरेज भी न किया,लेकिन इस चुनाव मे क्या रणनीतिक गलतियां हुई कि यह प्रभावकारी सिद्ध न हुआ।सपा के हार के कारणों मे बहुत से कारण गिनाए जा सकते है लेकिन मे कुछ विशेष कारणो का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूँ-



पहला कारण:-एंटी इनकम्बेंसी
भारतीय चुनाव परिदृश्य मे एंटी इनकम्बेंसी एक प्रमुख तथ्य है जिसका उदाहरण पांच राज्यों मे हुए विधानसभा चुनावों मे भी देखा जा सकता है। यदि भाजपा ने उप्र और उत्तराखंड मे दो तिहाई बहुमत से जीत हासिल की तो पंजाब मे अपने सहयोगी दल के साथ कांग्रेस द्वारा दो तिहाई बहुमत से पराजित भी हुई। गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत का हार एंटी इनकमबेंसी का जीता जागता उदाहरण है। ऐसे मे उत्तर प्रदेश अपवाद नही हो सकता था। इसके अलावा उत्तर प्रदेश मे 1990 के बाद जनता का वोट निर्णय का विश्वास किसी एक पार्टी पर स्थायी न रहा।2007 मे बसपा, 2012 मे सपा तथा 2017 मे भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर जनता ने परिवर्तन की मुहिम स्वयं संचालित की।


दुसरा कारण:- पिता-पुत्र विवाद
पिता-पुत्र विवाद सपा की हार का सबसे प्रमुख कारण माना जा सकता है। अखिलेश यादव द्वारा पार्टी पर कब्जा तथा मुलायम सिंह यादव की विवशता ने खांटी समाजवादी वोटरो मे असमंजस के साथ निराशा की भावना से ग्रसित कर दिया, साथ ही साथ मुलायम सिंह यादव से भावनाओं रूप से जुड़े नेताओं और वोटरो मे अखिलेश यादव के प्रति नकारात्मक भावना का संचार किया। इसके अलावा मुलायम सिंह यादव का स्वयं को प्रचार से दूर रखना खांटी समाजवादी वोटरों को हतोत्साहित किया और अन्य विकल्प के लिए वोटर विवश हुए !


तीसरा कारण:-शिवपाल यादव और उनके समर्थको की उपेक्षा
शिवपाल यादव को सपा के कद्दावर नेता के साथ ही जमीनी नेता भी माना जाता है ।जमीनी कार्यकताओं पर मुलायम सिंह यादव के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव शिवपाल यादव का ही है लेकिन पिता- पुत्र विवाद मे शिवपाल को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया गया, साथ ही साथ प्रचार कार्य से भी बंचित कर दिया जो कहीं न कहीं शिवपाल यादव के समर्थकों को निराश किया।


चौथा कारण: कांग्रेस से गठबंधन
अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस से चुनाव पूर्व गठबंधन उनको सीधे-2 नौसिखिया और राजनीतिक अदूरदर्शी युवा सिद्ध करता है। वर्तमान उत्तर प्रदेश मे कांग्रेस की चुनावी जमीन 'एक डूबती नैय्या' के समान पहले से प्रतीत हो रही थी, ऐसे मे पिछले विधानसभा चुनाव 224 सीट जीत कर धमाका करने वाली पार्टी के पास कांग्रेस से गठबंधन की कोई मजबूरी नही हो सकती। अखिलेश ने कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव पूर्व ही अपनी कमजोरी का प्रदर्शन कर दिया। इसके अलावा मुलायम सिंह यादव द्वारा इस गठबंधन को अवैध बताया जाना यह गठबंधन दोनों ही पार्टियों के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुआ।


पांचवां कारण: कमजोर मार्केटिंग और ब्रांडिंग
हिटलर का यह कथन कि झूठ को भी इतना प्रचारित करो कि जनता इसी झूठ को सत्य समझने लगे,अब यह चुनावों मे अक्षरशः प्रभावी हो चुका है। ऐसे मे यदि आप स्वयं द्वारा किए गए कार्यों को जनता को नही बता पा रहे तो आप निश्चित रूप से चुनावी लाभों से बंचित होना पड़ सकता है। अखिलेश यादव का 'काम बोलता है' नारा जनता को उतना प्रभावित नही कर सका जिसका मुख्य कारण द्वितीय श्रेणी के प्रचारकों का न होना है।सपा मे द्वितीय श्रेणी के प्रचारकों के इस अभाव का सबसे ज्यादा लाभ बीजेपी ने उठाया और अखिलेश यादव के इस नारे को हास्यास्पद बना दिया। इसके अलावा सपा ने नोटबंदी, सीमा पर लगातार हो रही घुसपैठ ,कालेधन पर सरकार की नाकामी ,किसानों की आय दुगना संबंधी दांवो जैसे ज्वलंत मुद्दों को भुनाने मे असफल रही, जब कि बीजेपी ने सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक से भी चुनावी लाभ ले लिया।जनता को उद्वेलित करने वाले तत्वों राष्ट्रवाद, देशभक्ति जैसी सार्वजनिक चीजों को बढ़ाने का भाजपा स्वयं को एकमात्र पार्टी घोषित करने सफल रही।


छठा कारण: - मायावती का सोशल इंजीनियरिंग
एमवाई समीकरण सपा का आधार वोटबैंक घोषित रूप मे सब जानते है लेकिन 2017 के विधानसभा सभा चुनाव मे मायावती द्वारा मुसलमानों को टिकट वितरण मे वरीयता देकर सपा के वोटबैंक मे सेंधमारी की कोशिश की गई जिससे मुस्लिम वोट के बंटवारे को नजरअंदाज नही किया जा सकता। मुस्लिम वोटों का यह बंटवारा सपा -बसपा दोनो के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुआ,क्योंकि देवबंद जैसी मुस्लिम बाहुल्य सीट भी भाजपा जीत गई।


सातवां कारण:- भाजपा का हिन्दू कार्ड
उत्तर प्रदेश के चुनाव मे भाजपा ने हिन्दू कार्ड खुल कर खेला और यह हिन्दू कार्ड लगभग मुस्लिम तुष्टीकरण जैसा ही माना जा सकता है। भाजपा नेता कारण चाहे जो भी बताएं लेकिन 403 विधानसभा सभा सीटों मे से एक भी मुसलमान को टिकट न देना कहीं न कहीं यह हिन्दू तुष्टीकरण की नीति का ही संकेत है,जो हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण मे महत्वपूर्ण फैक्टर बना। राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा कब्रिस्तान-शमशान जैसे अनुपयोगी मुद्दे को महत्वपूर्ण मुद्दा बनाने मे सफल रही, जब कि धर्मनिरपेक्ष जैसी संवैधानिक शब्दावली को सपा सहित सभी विपक्षी दल सही स्वरूप मे जनता के समक्ष प्रस्तुत करने मे असफल रहे।

आठवां कारण:- सोशल मीडिया की उपेक्षा
वर्तमान सामाजिक- राजनीतिक परिदृश्य मे सोशल मीडिया ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करायी है लेकिन सपा द्वारा इसके महत्व को न समझना एक चुनावी चूक साबित हुई। सोशल मीडिया चुनावों मे एक ऐसे प्रचार यंत्र के रूप मे उभर कर सामने आया है जिसके द्वारा अपनी बात को एक साथ लाखों-करोड़ों जनता तक पहुँचाया जा सकता है।


इस प्रकार सपा की हार मे तथाकथित मोदी की आंधी ने उतनी प्रभावशाली भूमिका नही निभायी जितनी की सपा की स्वयं गलत रणनीतियां रहीं।चुनाव मे एक रणनीतिक गलती ही कभी--२ पार्टी के पराजय का कारण बन जाती है और सपा ने तो न खत्म होने वाली रणनीतिक गलतियों की एक श्रंखला ही आरंभ कर थी जिसका लाभ समाकलित रूप से भारतीय जनता पार्टी ने उठा कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की