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त्यौहार हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक-समय के साथ पौराणिक पर्व होली में आई बुराइयों पर चिंतन-मन की बात-मेरे साथ- अजय श्रीवास्तव-एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव डॉट कॉम

त्यौहार हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक होते है। वे आशा ,आकांक्षा, उत्साह एवं उमंग के प्रदाता...

👤 Ajay2017-03-10 12:56:48.0
त्यौहार हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक-समय के साथ पौराणिक पर्व होली में आई बुराइयों पर चिंतन-मन की बात-मेरे साथ- अजय श्रीवास्तव-एडिटर इन चीफ_सत्यमेव जयते लाइव डॉट कॉम
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त्यौहार हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक होते है। वे आशा ,आकांक्षा, उत्साह एवं उमंग के प्रदाता है तथा मनोरंजन, उल्लास एवं आनन्द देकर वे हमारे जीवन को सरस बनाते है। त्यौहार युगों से चली आ रही हमारी सांस्कृतिक धरोहरों, परंपराओं, मान्यताओं एवं सामाजिक मूल्यों का मूर्त प्रतिबिम्ब है जो हमारी संस्कृति का अंतरस्पर्शी दर्शन कराते है। त्यौहारो की इस प्रथा ने ही भारत को मानव भूमि से देवभूमि बना दिया है।
भारतीय त्यौहारों मे होली विशिष्ट है।होली के मनाने के कारणों मे पूरे देश मे एकमत्य नही है जिसका प्रमुख कारण विभिन्न धार्मिक साहित्यों मे होली को लेकर अलग-2 प्रसंग दिए गये है। किन्तु होली की अन्य भारतीय त्यौहारों मे विशिष्टता उसके धार्मिक स्वरूप से ज्यादा सामाजिक स्वरूप के कारण है।आसान शब्दों मे होली का धर्म निरपेक्ष स्वरूप ही इसको विशिष्ट बनाता है। इसमें धर्म के अलावा लिंग, जाति,उम्र, तथा गरीब-धनवान का कोई महत्व नही होता है और सभी लोग एक दूसरे पर रंग-गुलाल उड़ाते है जिसमें कहीं भी सामाजिक असमानता नही दिखाई पड़ती। होली के सामाजिक महत्व को देखते हुए ही तमाम मुस्लिम शासक जैसे अकबर, मुहम्मद बिन तुगलक़, बहादुर शाह जफर आदि ने होली को प्रोत्साहित करने के साथ ही स्वयं को भी होली के रंग मे रंग लिये।
आज भारत मे सभी धर्मो के लोगों को होली का त्यौहार मनाते देखा जा सकता है किन्तु समय के साथ इसमेें तमाम बुराइयां आ गयीं है। इन बुराईयों मे भांग ठंडई के स्थान पर मदिरापान, देशी रंगों के स्थान पर हानिकारक रासायनिक रंगों का प्रयोग, स्वादिष्ट भोजनो के स्थान पर मांस सेवन वरीयता, लोकगीतों और लोकवाद्यों के स्थान पर शोरगुल युक्त फिल्मी गीतों का बजाया जाना, रंग-गुलाल लगाने के बहाने महिलाओं से अश्लीलता और हुड़दंगई को लिया जा सकता है जो होली के वास्तविक स्वरूप और इसको मनाने के पवित्र उद्देश्यों को धूमिल कर रही है।
जैसा कि मै पहले ही बता चुका हूँ कि हमारी अन्य राष्ट्रीय व सांस्कृतिक धरोहरों की भांति त्यौहार भी एक धरोहर है और इसमे विकृतियाँ लाकर हम स्वयं के साथ देश की गरिमा को भी हानि पहुँचा रहे है। अतः हम सभी भारतीयों का यह कर्तव्य के साथ उत्तरदायित्व भी है कि होली को सामाजिक बुराइयों से बचाकर इसको राष्ट्रीय व सामाजिक समामेलन के रूप मे मनाने की कोशिश करें, जिससे हमारे देश को 'असहिष्णुता' जैसे शब्दों का सामना न करना पड़े और होली सभी धर्मों-जातियों का एक साझा सामाजिक समामेलन मंच बन जाए।