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संतकबीरनगर:- चुनावी सुरूर के सामने फीका पड़ा फागुन का सुरूर_जे पी ओझा_सत्यमेव जयते लाइव

संतकबीरनगर:- फागुन का सुरूर अभी चुनावी सुरूर के आगे फीका दिख रहा है। लाल पत्तों से सजे पाकड़ के...

👤 Ajay2017-03-02 13:35:44.0
संतकबीरनगर:- चुनावी सुरूर के सामने फीका पड़ा फागुन का सुरूर_जे पी ओझा_सत्यमेव जयते लाइव
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संतकबीरनगर:- फागुन का सुरूर अभी चुनावी सुरूर के आगे फीका दिख रहा है। लाल पत्तों से सजे पाकड़ के पेंड़, झड़े पत्तों और गोदा लगे पीपल के पेंड़ों पर फुदकते सैकड़ों पच्छी, बौरों से मतवाले आम के पेंड़ों पर सर्रा मार कर चढ़ती गिलहरियां सब उदास हैं। पीले फूलों से लदा अमलतास भी चुनावी चखचख में भुला दिए जाने से उदास है। लेकिन सब पर नई सरकार के आने की तारी उत्सुकता को आज इन तमाम खुशियों की ओर नजर तक फेरने की फुरसत नहीं है। जिन कुछ गांवों में फागुनी बयार बहते ही रात में फगुआ की महफिलें सज जाती थीं वहां भी महफिलों में किसको जीत तो बाकियों को हार के चरचे हैं। यूं तो शहरीकरण नें हम सबसे प्रकृति को पहले ही छीन लिया है और कभी तमाम अभावों के बीच जो मस्ती फागुन आते ही छलकने लगती थी, परदेशियों को अपना गांव, अपने दोस्त, अपनी फगुआ की महफिल और गांव की भौजाइयां याद आने लगती थीं। गांव में रह रही नवोढ़ा को फागुन का बेसब्र इंतजार रहता था कि फगुआ में तो बालम जरूर आएंगे। लेकिन रोज बढ़ती जिंदगी की मुसीबतें, बढ़ती मंहगाई, भाग दौड़ ने जिंदगी बेरंग कर दी और फागुन बस एक त्योहार भर बन कर रह गया है। काश, कोई सारा तनाव, दिमागी बोझ, तमाम पैसा लेकर भी हम सबको हमारी फागुनी मस्ती लौटा देता, हमारे फगुआ की धुन फिर से सुना देता तो शायद किसी को यह सौदा मंहगा नहीं लगता।