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बलत्कार एवं हत्या,जिम्मेदार कौन?कानून या सरकार या संस्कार।क्यों नहीं रुक रहीं ऐसी जघन्य घटनाएं,ऐसी घटनाओं में जाति-पाति कार्ड खेलना कितना सही_विश्लेषण-मो.अदनान दुर्रानी

आज देश के हर कोने से मासूम बच्चियों समेत युवतियों एवं बुजुर्ग महिलाओं तक से बलत्कार और उसके बाद...

बलत्कार एवं हत्या,जिम्मेदार कौन?कानून या सरकार या संस्कार।क्यों नहीं रुक रहीं ऐसी जघन्य घटनाएं,ऐसी घटनाओं में जाति-पाति कार्ड खेलना कितना सही_विश्लेषण-मो.अदनान दुर्रानी
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आज देश के हर कोने से मासूम बच्चियों समेत युवतियों एवं बुजुर्ग महिलाओं तक से बलत्कार और उसके बाद उनकी निर्मम हत्या की खबरें आ रही हैं ।आज हम कोई भी न्यूज चैनल खोलते हैं तो कहीं न कहीं ऐसी घिनौना घटना सामने आ जाती है और सुबह का अखबार उठाते हैं तो उसके सभी पेज पर ऐसी घिनौनी घटनाओं की एक बानगी जरूर देखने को मिल जाती है ।आखिर समाज में रहने वाले लोग इतने वीभत्स कैसे होते जा रहे हैं ? इसका जिम्मेदार कौन है ? हमारा संस्कार या हमारा कानून या हमारी सरकार ।

हैदराबाद में हुए एक महिला डाक्टर के साथ पहले जबरदस्ती बलत्कार किया गया फिर उसको पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया एक ऐसा घिनौना कृत्यु हुआ जिसके बारे में सोचकर ही मन सिहर उठा रूह कापं उठी और मन और दिल यह सोचने पर मजबूर हो गया कि इंसान की सोच जानवरों से बदतर कैसे हो गयी ।पूरे देश से इस मामले में सख्त सजा की मागं उठने लगी और आरोपियों को फांसी की सजा की मागं की जाने लगी ।जो विगत वर्षों दिल्ली में हुए निर्भया के साथ दरिंदगी के मामले में हुआ था ।लोग सड़कों पर निकले ।जगह-जगह धरना प्रदर्शन हुए लेकिन अभी भी निर्भया की मां अदालत के चक्कर काट रही है इंसाफ के लिए ।

एक आंकडे के मुताबिक देश में हर पाचं मिनट में रेप की एक घटना होती है जोकि काफी शर्मनाक है ।

बलात्कार एक ऐसा लफ्ज़ है, जिसे सुनते ही रूह कांप उठती है। दुनियाभर में होने वाली हिंसा का यह सबसे बुरा रूप है। इस शब्द को सुनने का मतलब ही मानवता को शर्मसार करना है। आजकल यह शब्द सुनना आम बात हो गई है क्योंकि बलात्कार जैसी घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं।

अगर हम संवेदनशील हैं, तो ऐसी खबरें हमें बुरी तरह से प्रभावित करती हैं, अन्यथा यह हमारे लिए सामान्य बन जाती है। इससे यह पता चलता है कि हमारे अंदर से इंसानियत खोती जा रही है।

6 महीनों में 24,212 बलात्कार

आजकल के आंकड़े बता रहे हैं कि हम एक समाज के तौर पर कितने खोखले हो चुके हैं। देखा जाए तो यह आंकड़े हमारे पढ़े-लिखे समाज के काले सच को दर्शा रहे हैं। देशभर के हाई कोर्ट से आए आंकड़ों के अनुसार सिर्फ 6 महीनों में यानि 1 जनवरी 2019 से 30 जून 2019 के बीच भारत में बच्चियों के बलात्कार के 24,212 मामले दर्ज़ किए गए हैं। इस हिसाब से 1 महीने में 4000, एक दिन में 130 और हर 5 मिनट में एक बलात्कार की घटना दर्ज़ हुई है।

यह आंकड़े हमारे समाज के घिनौने रूप को दर्शा रहे हैं, जो अपनी घिनौनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए उम्र की सीमाओं को भी नहीं देखते। 6 महीने की बच्ची हो या 60 साल की औरत, ऐसे लोग किसी को भी नहीं छोड़ते हैं।

पिछले दिनों कुछ शर्मसार कर देने वाली घटनाएं इस तरह हैं ।

राजस्थान से एक शर्मसार कर देने वाली खबर सामने आई, जहां एक 15 वर्षीय नाबालिग को 9 महीने की बच्ची के साथ रेप करने के आरोप में हिरासत में लिया गया है। पुलिस ने कहा कि पीड़ित बच्ची का हिन्दौन टाउन के एक सरकारी अस्पताल में इलाज किया जा रहा है।

कुछ ही दिन पहले दिल्ली के द्वारका सेक्टर 23 में एक छह साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म की दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई। बच्ची खून से लथपथ बेसुध हालत में रोड के किनारे झाड़ियों में मिली थी। किसी राहगीर ने उसे देखा और पुलिस को सूचना दी।

हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर एक दिव्यांग युवक द्वारा पांच साल की बच्ची से रेप का मामला भी सामने आया। पुलिस के अनुसार सीसीटीवी फुटेज में आरोपी प्लेटफॉर्म संख्या 6 पर सो रही बच्ची को उसके अभिभावक के बगल से उठाकर उसे लेकर जाता दिखा।

2015 की तुलना में 2016 में बलात्कार 12.4% बढ़े

आंकड़ों के मुताबिक हमारे देश में रोज़ 130 बलात्कार होते हैं। यह सोच कर शर्म आती है कि हम कैसे समाज में रह रहे हैं। नैश्नल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बलात्कार के मामले 2015 की तुलना में 2016 में 12.4% बढ़े। 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले देश में दर्ज़ हुए थे।

2019 में बस इन 6 महीनों में ही बलात्कार के 24,212 मामले दर्ज़ हुए हैं, जिनमें से 11,981 मामलों में अभी जांच चल रही है, जबकि 12,231 मामलों में पुलिस आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है। इनमें से ट्रायल सिर्फ 6449 केस का ही चल रहा है, वहीं 4871 मामलों में अभी ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ है। ट्रायल कोर्ट ने अभी तक 911 मामलों में फैसला सुनाया है, जो कि कुल संख्या का मात्र 4% है।

यह भयावह आंकड़े देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए हर ज़िले में विशेष अदालतों की स्थापना करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन अदालतों में केवल बच्चों से जुड़े यौन शोषण की सुनवाई होगी और साथ ही कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि 60 दिन के अंदर इन अदालतों का गठन किया जाए।लेकिन क्या ऐसा हो रहा है बिल्कुल नहीं ।

आखिर क्या वजह है कि ऐसी घटनाओं पर लगाम नहीं लग पा रही है ।

तो वहीं दूसरी ओर शोसल मीडिया जैसे प्लेटफार्म पर कुछ ग्रुप्स और फर्जी आईडी के द्वारा भी ऐसे जघन्य कृत्यों को हिंदू-मुस्लिम का रूप देकर धार्मिक भावनाओं के साथ खेलने की कोशिश से यह साबित हो रहा है कि कुछ इंसान।जहनी तौर पर नंपुंसक हो गये हैं ।और कानून जानबूझकर ऐसे कृत्यों से भाग रहा है या तो वह ऐसे मामलों में कुछ करना नहीं चाहता है ।शायद ऐसे लोग सोच रहे हैं ऐसा कर हम एक दूसरे के प्रति अच्छे साबित होंगें लेकिन पीठ पीछे वह ऐसे घिनौने कृत्य करने वालों को बढावा ही दे रहे हैं ।

ऐसे कृत्यों पर रोक लगने का यही तरीका है कि सरकार और कोर्ट ऐसे मामलों में प्रमुखता देकर फौरन सुनवाई कर सख्त सजा दें न कि ऐसे मामलों में तारीख पर तारीख देकर लंबित करें ।तो दूसरी ओर हमें अपने संस्कार अभी और बेहतर करने होगें ।बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छी परवरिश महिलाओं की इज्जत और सम्मान करने पर अधिक जोर देना होगा ।और सबसे जरूरी बात यह है कि शोसल मीडिया पर कुछ ऐसे ऐप और साइट्स हैं जिससे अश्लीलता को बढावा मिल रहा है जिसपर पूर्णरूप से प्रतिबंध जरूरी है ।हो सके तो अपने बच्चों को मोबाइल से दूर रखें ।

हमारी मेनस्ट्रीम मीडिया सरकार से ऐसे जघन्य कृत्यों पर सख्त कार्यवाही के बजाय दो चार पार्टी के प्रवक्ताओं को लेकर टीवी डिबेट में बैठाकर एक दूसरे पर लाक्षन लगाते रहते हैं और उसी समय देश में कहीं किसी कोने पर एक देवी का फिर से चीरहरण हो रहा होता है ।क्या मोमबत्ती जलाकर सडक पर निकलने से इस मामले का हल होगा बिल्कुल नहीं ।बल्कि हम जब ऐसे मामलों में सडकों पर निकलें और इतनी संख्या में निकले कि सरकार मजबूर हो जाए ।सरकार से ऐसे जघन्य कृत्यों में फौरी सजा की मागं की जाए ।भारत देश विभिन्न संस्कृतियों का मिला जुला एक ऐसा मेल है जिसकी मिशाल दुनिया में कहीं नहीं मिलती है ।यहां महिलाओं को देवी माना गया है लेकिन यहीं पर हर पाचं मिनट में एक देवी के साथ दरिंदगी की हद पार कर दी जाती है ।हम पश्चिमी सभ्यता को बहुत तेज फालो कर रहे हैं उनके रहन-सहन उनके खान-पान ।लेकिन संस्कार में हम काफी पीछे छूट गये हैं जिसपर देश के हर वर्ग के हर परिवार को इसके बारे में गंभीरता से विचार करना होगा और इसपर अमल करना होगा ।क्योंकि ऐसे दरिंदे अपनी हवस की पूर्ति के कुछ भी घिनौना कार्य कर सकते हैं ।दूसरी महिलाओं को भी अब अपनी सुरक्षा से संबंधित वस्तु लेकर अपने साथ चलना होगा ताकि आकस्मिक घटनाओं को वह कुछ हदतक रोक सकें ।

यह लेखक के निजी विचार हैं।आंकडे नेशनल क्राइम ब्युरो के हैं ।