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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मन की बात- मेरे साथ_अजय श्रीवास्तव-एडिटर इन चीफ-सत्यमेव जयते लाइव वेब पोर्टल न्यूज़_

बड़े अफसोस की बात है कि जिस भूमि में सभ्यता की शुरुआत ही 'मातृसत्तात्मक' अवस्था में हुई, जहाँ...

👤 Ajay2017-03-08 10:05:27.0
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मन की बात- मेरे साथ_अजय श्रीवास्तव-एडिटर इन चीफ-सत्यमेव जयते लाइव वेब पोर्टल न्यूज़_
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बड़े अफसोस की बात है कि जिस भूमि में सभ्यता की शुरुआत ही 'मातृसत्तात्मक' अवस्था में हुई, जहाँ शाश्त्रों में कहा गया ह.." यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" । वहाँ आज महिलाओं को सम्मान देने के लिए 'महिला-दिवस' जैसे दिन निर्धारित करने पड़े हैं।

आज, जो महिलाओं की मन-वाकिफ़ कपडों पर टिप्पणी करते रहते होंगे, वो भी महिला दिवस की बधाइयाँ देते फिर रहे हैं।
हड़प्पा की पगडंडियों से चलता हुआ हमारा समाज आज महानगरों की चकाचौंध में तब्दील तो हो गया है, लेकिन आज भी सम्पन्न महिला का नाम उँगलियों पर गिन कर बतानेवाली स्थिति है।
और पुरुषों के मामले में.....??????? अरे भाईलोग आपका तो सारा संसार ही है ।
सारी उपलब्धियां तो आप ही की हैं।
स्त्री के जीवन में भी ऐसा घट सकता था, यदि वह पुरूष के समाज में 'अन्य' स्थिति में नही होती । उसके अपने उद्देश्य होते, अपनी परियोजनाएं होती, जिसमे वह लग जाती, पुरुष को बिना उपकरण बनाए।।
स्त्री अपने भाग्य को जैरी है। उसकी मुक्ति निर्भर करती है उस तानाशाह पुरुष पर, जिसने उसको बनाया और जो जब चाहे उसको मिटा सकता है। अपनी नियति को उसके हाथों में सौंपकर स्त्री भय से कांपती रहती है।
स्त्री एक त्रासद और शक्तिहीन द्रष्टा होती है अपने भाग्य की । लेकिन फिर भी औरत पुरुष के बराबर तभी हो सकती है जब वह निरन्तर अपने जीवन की सतत् आहुति में लगी रहती है । इस शर्तहीन भक्ति और पूज्यभाव से पुरुष के अहम् की ही तुष्टि होती है, फिर भी हम बड़े हर्षित होते हैं , और "महिला दिवस" को साल दर साल कभी झेल रहे हैं, कभी मना रहें हैं।
लेकिन जिस दिन औरत के लिए सम्भव होगा की वह पुरुष से किसी मजबूरी या क्षतिपूर्ति के लिए प्यार न करे , वह खुद से पलायन न करे, बल्कि अपना आत्मबोध प्राप्त करे, अपने को निचे न गिराकर अपना आत्मप्रतिस्थापित करे, वही दिन असल मायने में महिला दिवस होगा ।