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संतकबीरनगर:- होली का सुरूर और चुनावी चिंता पर चिंतन -वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा का विचार_सत्यमेव जयते लाइव

संतकबीरनगर:- होली का सुरूर और चुनावी नतीजों की चिंता का काकटेल गजब का मूड बना रहा है। दो दोस्त मिले...

👤 Ajay2017-03-03 16:40:14.0
संतकबीरनगर:- होली का सुरूर और चुनावी चिंता पर चिंतन -वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा का विचार_सत्यमेव जयते लाइव
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संतकबीरनगर:- होली का सुरूर और चुनावी नतीजों की चिंता का काकटेल गजब का मूड बना रहा है। दो दोस्त मिले कि चुनावी नतीजों की चरचा शुरू हो जाती है। सबके पास अपने अपने तर्क हैं । सबके पास एक जीता हुआ नाम है। उसकी जीत के तमाम तर्क हैं लेकिन फिर भी बेचैनी जबरदस्त है। दूसरों की सहमति, अव्वल तो मिल नहीं पाती, लेकिन मिल भी गई तो प्यास नहीं बुझती। तमाम दोस्तों को खलीलाबाद विधान सभा सीट के नतीजे को लेकर जबरदस्त उत्सुकता है। वोटरों की खामोशी और अपेच्छा कृत कम मतदान ने सबको भ्रम में डाल दिया है। वोटरों की चुप्पी का सबसे बड़ा कारण उनकी उलझन ही है। पार्टियों के गजब खेल ने भी मतदाताओं की उदासीनता और चुप्पी को गाढ़ा कर दिया। सबसे बड़ा झटका तो सपा ने अपने वोटरों को दिया। सुबोध यादव का टिकट काट कर सपा ने अनाम से प्रत्याशी को टिकट थमा दिया। नतीजा यह हुआ कि पूरे जिले में यादव अनमने हो गए। मुस्लिमों को भी सपा से कमजोर प्रत्याशी देख कर सपाई हार का डर सताने लगा। नतीजा यह हुआ कि खलीलाबाद विधान सभा सीट के सपा के बेस मतदाता उलझन में नजर आए। तमाम मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को हराने की ग्रंथि के चलते दूसरे दलों का पाला थाम लिया तो यादव वोट भी बुरी तरह भ्रम में थे। वोट के दिन बूथों पर सपाई मतदाता अनमने रहे। तमाम खांटी सपाई मत तक देने से कतरा गए और खास कर यादवों के मतों में दो फाड़ हो गया। प्रतिबद्ध वोटरों ने तो सपा को ही वोट दिया लेकिन सुबोध यादव का टिकट कट जाने से तमाम यादव मतदाताओं ने भाजपा को भी जम कर उपकृत किया। यादवों की तर्ज पर केवट, कहांर, भर, बेलदार, कुर्मी, नाई, धोबी, दरजी, कोइरी, चौरसिया जैसे तमाम लोगों ने भी बडी संख्या में भाजपा का पाला पकड़ लिया। इन वर्गों के वोट बसपा को भी मिले लेकिन उनकी गिनती कुछ कम ही रही ऐसी चरचा है। बात करें सवर्ण वोटरों की तो अधिकांश मत एक सुर होकर भाजपा को ताकत देते दिखे। बसपा को अपने प्रतिबद्ध मतों के साथ ही सपा से नाराज ( टिकट को लेकर ) तमाम लोगों ने प्रधानी चुनाव की गणित में बसपा का साथ दिया। यह खेल बनियाबारी, विश्वनाथपुर , तामेश्वरनाथ सहित कई गांवों में खुल कर खेला गया। बात करें पीस पार्टी के डाक्टर अयूब की तो उन्हें मुस्लिम मतों का बड़ा हिस्सा मिला बावजूद इसके कि उन पर एक मासूम की मौत का और उससे जबर जिना का संगीन आरोप लगा। आंका जा रहा है कि मुस्लिमों की पिछड़ी कौमों ने डाक्टर अयूब को जम कर वोट दिए। बात करें बसपाई प्रत्याशी मशहूर आलम चौधरी की तो उनके विरोधी भी मानते हैं कि बसपा के बेस वोटरों के अलावा उन्हें मुस्लिम मतों की बड़ी बिरादरियों का तगड़ा समर्थन मिला। लेकिन वह गिनती में कितना है इस पर सबकी अलग अलग दलीलें हैं।कुल मिला कर लड़ाई बसपा भाजपा और पीस पार्टी के बीच है। भाजपा कुछ मजबूत है। बसपा को अगर शेख पठानों के साथ कुछ पिछड़े मुस्लिम मतों का फायदा है तो भाजपा से बसपा ही लड़ती दिखती है। पीस पार्टी को इस बार मुस्लिम मतों के साथ जुड़ने वाले अति पिछड़े मतदाताओं की उदासीनता और कमी खलेगी और यह कमी फैसलाकुन होगी। सपा का प्रदर्शन कमजोर रहेगा और सीएम अखिलेश का खलीलाबाद न आना सपा को आने वाले कई चुनावों में दर्द देगा। सभी भाजपा प्रत्याशी जय चौबे को ही अपना प्रमुख प्रतिद्वंदी मान रहे हैं और यही बात उन्हें जीत के पोडियम के सबसे पास दिखा रही है। नतीजा आने तक जय चौबे को विजेता मानने वाले बहुत हैं और अब की नहीं तो कभी नहीं की चरचा उन्हें ही सबसे मजबूत दिखा रही है।