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संतकबीरनगर:- जीत के कयासों पर एक मंथन _वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा की कलम से _सत्यमेव जयते लाइव

संतकबीरनगर :- मतदान के बाद कयासों का दौर है। सब के पास अपने प्रत्याशी की जीत के बेहद मजबूत तर्क...

👤 Ajay2017-02-28 15:14:09.0
संतकबीरनगर:- जीत के कयासों पर एक मंथन _वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा की कलम से _सत्यमेव जयते लाइव
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संतकबीरनगर :- मतदान के बाद कयासों का दौर है। सब के पास अपने प्रत्याशी की जीत के बेहद मजबूत तर्क हैं। सपा, बसपा, भाजपा और यहां तक कि एमआईएम और पीस पार्टी भी अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। जीतने को तो कई निर्दलीय और खलीलाबाद में गंगा सिंह सैथवार को भी जीत की पूरी आशा है। अब वोटरों ने किसकी किस्मत कैसे लिखी है यह पोल तो ११ मार्च को ही खुलेगी।
राज पाट का शब्द जिसने ईजाद किया उसके दिमाग की दाद देनी होगी। सत्ता और प्रभुता सिर चढ़ कर बोलती है और इसका नशा गजब का होता है। विधायक तो विधायक ब्लाक प्रमुख और ग्राम प्रधान तक का जलवा जबरदस्त होता है। सत्ता के साथ मद ( नशा ) और चमचे दोनों का उंगली नाखून का संबंध है। बिना कनफुंकवों के जनप्रतिनिधि हलका दिखता है। नेता का बड़प्पन उसके पीछे चलने वाली गाड़ियों की कतार से तय होता है। चमचे नेता का आभा मंडल गढ़ते हैं। इसको टाइट कर दिया, उसको हड़का दिया, उनका काम चुटकी बजाते भर में करा दिया ऐसी तमाम बातों के साथ बिना हमारे तो नेता जी सांस तक नहीं लेते यह तकिया कलाम हर चट्टे बट्टे की जुबान पर जैसे मढ़ा होता है। इसी नशे के लिए नेता करोणों फूकता है और हार कर भी फिर दुबारा कमर कसने लगता है।
जनसेवा का धंधा कितना मुफीद है, इसे जहान जानता है। खुद नेता ही बखानते हैं। फटी चप्पलें पहन कर बड़े नेताओं के पीछे दौड़ने वाले ही तरक्की पाकर नेता कहाते हैं और ठेका, पट्टा, दलाली मुर्दाली से शुरू होकर इनकी तरक्की का अनथमा सफर अर्श को भी फलांगने लगता है। नरोत्तम दास की सुदामा चरित की दो लाइनें कि " का पग में पनही न हती, अब लै गजराजहु ठाढै महावत " वोटर आजादी के बाद से ही देखता आ रहा है। इस बार भी कुछ नया नहीं होगा। तमाम दलों ने, उनके नेताओं ने वोटरों को विकास के सवालों के आसपास नहीं फटकने दिया। वोटर जितनी जल्दी हिंदू मुस्लिम बन जाय उतना तेजी से इनके चेहरों पर मुस्कान सजती है। दूसरी कोशिश जातिवाद का नशा चखाने का होता है। फलां बिरादरी फलां नेता के इशारे पर चलती है यह खौफ बनाने का काम चमचे ही करते हैं।

वोट बटोरने का तीसरा कारगर नुस्खा छेत्रवाद का है। फलां बाहरी फलां जवारी की चरचा नेता के गुरगे पसारते हैं । यही तीन नुस्खे कितने अक्सीर हैं इसे यही बात साबित करती है कि बार बार हकीकत जान कर भी लोग इस जाल में फंस ही जाते हैं। दारू, सौ, दो सौ, पांच सौ और हजार दो हजार में वोटर बिकते हैं और वोटों के दलाल उन्हें खरीदते भी हैं। इस बार भी यही नुस्खे ही जीतेंगे और वोटर फिर हारेगा, विकास फिर हारेगा, आपसी मेल मुहब्बत मारी जाएगी और आपसी खटास और बढ़ेगी यह तो तय ही जानिए। अब हम अपनी करनी पसार चुके। अब नेताओं की बारी है। दो महीने विनीत बने, चरण छूते नेताओं का रूप बदलने का समय है। पांच साल हम पछताएंगे। गरिआएंगे लेकिन ये सब जानते हैं कि न वोटर सुधरेगा न नेता बदलेंगे। जयहिंद जय भारत।