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संतकबीरनगर:- दिलचस्प मोड़ पर पहुँची मेंहदावल की लड़ाई-वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा की कलम से

संतकबीरनगर:- आइए हाल जानें मेंहदावल का। क्या हाल है ताबिश का और क्या कमाल कर रहे अपने जयराम पांडे।...

👤 Ajay2017-02-25 19:45:45.0
संतकबीरनगर:- दिलचस्प मोड़ पर पहुँची मेंहदावल की लड़ाई-वरिष्ठ पत्रकार जे पी ओझा की कलम से
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संतकबीरनगर:- आइए हाल जानें मेंहदावल का। क्या हाल है ताबिश का और क्या कमाल कर रहे अपने जयराम पांडे। हाल जानें पप्पू की तो अपने अनिल त्रिपाठी का जंगी काफिला कहां पहुंचा है। पीस पार्टी कहां है। ये पांच कोण हैं मेंहदावल के जिन को जाने छाने बिना चुनावी तस्वीर का रंग नहीं दिखता।
मेंहदावल के बारे में सबसे बड़ी बात यह कि इस के विकास को न जाने कौन सा घुन लग गया। पिछले दो दशक से मेंहदावल के विकास की गाड़ी वहीं की वहींं अटकी है। टूटी सड़कें, बेहाल खेती राम भरोसे बिजली, बदहाल बुनकर, चिंतित किसान। काम न मिलने से परदेशी बनने को मजबूर युवा, भविष्य की चिंता से परेशान बुजुर्ग। कम शब्दों में मेंहदावल विधान सभा छेत्र की यही कहानी है। सपा की बीस सालों से थाती बन चुके इस विधान सभा सीट को दो दो बार प्रदेश में सपा की सरकार मिली लेकिन मेंहदावल छेत्र में विकास की बात ही नहीं शुरू हो पाई। इस नजारे का सबसे बड़ा कारण यही है कि यहां विकास कोई मुद्दा नहीं रहा। नेताओं ने यहां जातिवादी और धर्म वादी राजनीति की फसल बोई और वोटरों ने उनकी बात में आकर अपने मुस्तकबिल पर स्याही ही पोती है।
इस बार का चुनाव विकास के इन तमाम सवालों के साथ खड़ा है। लेकिन मुद्दों में विकास की बात बस नारों में दिखती है। बसपा दलित ब्राहमण गठजोड़ के साथ सपा से छिटके वोटरों को जोड़ने में परेशान है तो एमआईएम मुस्लिम ताकत दिखाने की चिंता में है। पीस पार्टी पिछड़े मुस्लिमों को बरगला रही है और भाजपा को हिंदू मुस्लिम तनाव की आशा है। सपा का पूरा कारवां यादव, भूमिहार मतों के साथ गैर भाजपाई ब्राहमणों और छिटकते मुस्लिमों को जोड़ने में व्यस्त है। इस नजारे में हमको विकास की चिंता कहीं, किसी में दिखती ही नहीं। किसी को बखिरा झील की बदहाली की चिंता नहीं। किसी को खलीलाबाद मेंहदावल मार्ग की दुरगति की चिंता नहीं। किसी को रोज सिसकते हजारों बुनकर परिवारों, सैकड़ों बखिरा वासी ठठेरों की चिंता नहीं। कोई खेती, किसानी, सिंचाई, बिजली, बदहाल प्रायमरी और जूनियर विद्यालयों की दुरगति सुधारने की बात नहीं करता। कोई थानों से, तहसील से, रजिस्ट्री से कमीशन खोर दल्लों का कब्जा हटाने की बात नहीं कर रहा। बात घिनौने गोवध के धंधे में लगे सैकड़ों परिवारों को इज्जत दार काम देकर उनको सम्मान से जीने का मौका देने की नहीं हो रही। पटते ताल पोखरे, हरामखोर बन चुके सफाई कर्मियों, हर महीने बच्चों और गर्भवती महिलाओं का पोषाहार और गरम पोषाहार हड़पने वाली आंगनवाणी कार्यकर्तियो की नहीं हो रही है। बात आखिर पढ़ाई पर कोई प्रत्याशी क्यों नहीं करता। आखिर कब तक मेंहदावल के नेता वोटरों को उकसा कर उनको बांट कर वोट लेकर लखनऊ और दिल्ली जाते रहेंगे और कब तक मेंहदावल वासी इन समाज विरोधी स्वार्थी नेताओं के चक्कर में उलझे रहेंगे। कब हिंदू मुस्लिम दोनो को लड़ाने वालों के मुंह पर कालिख मली जाएगी और कब मेंहदावल के लाखों वोटर होश में आकर विकास के सवालों पर वोट देना सीखेंगे। आखिरी सवाल मेंहदावल के जागरूक कहे जाने वाले शुतुरमुर्गी बुद्धिजीवियों से कि वे क्यों चुप हैं। क्या ये मुद्दे मेंहदावल के वोटरों के बीच जगाना उनकी जिम्मेदारी नहीं। जागो दोस्तों। फेसबुक और वाट्स अप को बदलाव के संदेश की मुहिम बनाओ। ये मुद्दे मेंहदावल में गूंजे इस मुहिम में भागीदारी करें और हर जागरूक तक ये बात पहुच सके इस के लिए आखिरी तीन दिन आवाज उठाएं।